एक पिता के बेबाक और वायरल बयान ने सोशल मीडिया पर दिखाई ऐसी सच्चाई
आज के इस आधुनिक और तेजी से बदलते दौर में जहां एक तरफ जेंडर इक्वलिटी और महिला सशक्तिकरण को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ हमारे घरों और समाज के भीतर छिपी पितृसत्तात्मक सोच की परतें आज भी वैसी की वैसी ही मजबूत बनी हुई हैं। सोशल मीडिया की दुनिया में इन दिनों एक आम भारतीय पुरुष का लिखा हुआ या कहा गया ऐसा ही एक अत्यंत संवेदनशील और विचारोत्तेजक बयान आग की तरह फैल रहा है, जिसने समाज के सामने एक बहुत बड़ा और कड़वा आईना रख दिया है। उस शख्स ने बेहद बेबाकी से इस बात को रेखांकित किया है कि कैसे हमारे समाज में यदि एक पिता अपने बच्चे की देखभाल या घर के काम में चींटी के बराबर यानी जरा सा भी योगदान दे देता है, तो उसे आसमान सिर पर उठा लिया जाता है और उसकी ऐसी वाहवाही होती है मानो उसने कोई ऐतिहासिक जंग जीत ली हो। इस एक छोटे से वाक्य ने इंटरनेट पर बहस का एक बहुत बड़ा बवंडर खड़ा कर दिया है और लोग इस बात पर मजबूर हो गए हैं कि वे अपने घरों के भीतर माता-पिता की भूमिकाओं और उनके बीच बंटे हुए कामों के तौर-तरीकों पर फिर से गहराई से विचार करें।
पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे मापदंड और परवरिश के नाम पर पुरुषों को मिलने वाली अनकही छूट
इस वायरल हो रहे बयान के केंद्र में जो मुख्य दर्द और सामाजिक विसंगति छिपी है, वह इस बात को उजागर करती है कि कैसे पीढ़ियों से यह मान लिया गया है कि बच्चों का लालन-पालन, उन्हें संभालना, खाना बनाना और घर की अन्य जिम्मेदारियां निभाना केवल और केवल एक मां का ही प्राथमिक और प्राकृतिक कर्तव्य है। इसके विपरीत, यदि कोई पिता कभी-कभार अपनी मर्जी से बच्चे को पार्क घुमाने ले जाता है, उसे डायपर पहना देता है या स्कूल से घर ले आता है, तो रिश्तेदार और आस-पड़ोस के लोग उसकी इस साधारण सी जिम्मेदारी को भी एक बहुत बड़े 'महान त्याग' के रूप में पेश करने लगते हैं। समाज की यह दोहरी मानसिकता न केवल महिलाओं के दैनिक संघर्षों को कम करके आंकती है, बल्कि उन पुरुषों के साथ भी अन्याय करती है जो सचमुच अपनी पत्नी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बराबरी का जीवन जीना चाहते हैं। इस प्रकार की रूढ़िवादी सोच यह साबित करती है कि हमने पुरुषों के लिए पारिवारिक जिम्मेदारियों के मानक इतने नीचे तय कर रखे हैं कि थोड़ा सा भी प्रयास करने पर उन्हें भगवान का दर्जा दे दिया जाता है।
मां के अंतहीन बलिदानों की अनदेखी और पिता के छोटे से प्रयास पर मिलने वाली भारी-भरकम तारीफ
जब एक मां चौबीसों घंटे बिना किसी छुट्टी या आराम के अपने बच्चे की परवरिश में अपना पूरा जीवन खपा देती है, उसके खाने-सोने और स्वास्थ्य का ध्यान रखती है, तो समाज इस त्याग को बहुत ही सामान्य और स्वाभाविक मानकर नजरअंदाज कर देता है। इसके उलट, जब एक पिता हफ्ते में एक बार बच्चे को गोद में उठा लेता है या रात में एक बार उसे लोरी सुना देता है, तो सोशल मीडिया पर उसकी तारीफों के पुल बांध दिए जाते हैं और उसे 'बेस्ट फादर ऑफ द ईयर' का खिताब दे दिया जाता है। यह विडंबना ही है कि जहां एक तरफ मातृधर्म को बिना किसी श्रेय के कर्तव्य मान लिया जाता है, वहीं पितृत्व के मामूली से अंश को भी सेलिब्रेट किया जाने लगता है। इस गहरी सामाजिक असमानता ने आज की नई पीढ़ी के उन जागरूक युवाओं को झकझोर कर रख दिया है जो लिंग आधारित भेदभाव और रूढ़ियों को तोड़कर एक स्वस्थ, संतुलित और समान साझेदारी वाला पारिवारिक जीवन जीना चाहते हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ी तीखी बहस, नेटिज़न्स ने अपने अनुभवों के साथ दिए समर्थन और विरोध के तर्क
जैसे ही यह विचार इंटरनेट के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर शेयर किया गया, वैसे ही इस पर लाइक्स, कमेंट्स और शेयर की बाढ़ आ गई और नेटिज़न्स दो अलग-अलग वैचारिक खेमों में बंट गए। एक बड़े वर्ग ने, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और संवेदनशील पुरुष शामिल हैं, इस बात का पूर्ण समर्थन किया और कहा कि यह बयान हर भारतीय घर की कड़वी और छुपी हुई सच्चाई को बयां करता है। लोगों ने अपने निजी जीवन के उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उनके घरों में भी पतियों के छोटे-छोटे प्रयासों को भी बहुत बड़ा मान लिया जाता है, जबकि पत्नियों के अंतहीन योगदान को ग्रांटेड ले लिया जाता है। हालांकि, कुछ लोगों का यह भी तर्क था कि समय के साथ अब चीजें बदल रही हैं और आज के यंग फादर्स अपने बच्चों की परवरिश में अपनी पत्नियों का पूरा साथ दे रहे हैं, इसलिए हर किसी को एक ही लाठी से हांकना सही नहीं है।
बदलाव की बयार और आधुनिक परिवारों में पैर पसारती समान साझेदारी की एक खूबसूरत उम्मीद
भले ही समाज की पुरानी सोच अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, लेकिन इस तरह के बेबाक बयानों और सोशल मीडिया पर होने वाली खुली बहसों से यह साफ जाहिर होता है कि अब लोग बदलाव की ओर कदम बढ़ाने लगे हैं। आज के आधुनिक युग में कई ऐसे युवा जोड़े देखने को मिल रहे हैं जो रूढ़िवादी जंजीरों को तोड़कर घर के कामों और बच्चों की परवरिश को पचास-पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ साझा कर रहे हैं। बिना किसी दिखावे या वाहवाही की भूख के, वे एक-दूसरे के सपनों और जिम्मेदारियों का सम्मान कर रहे हैं। यह वायरल बयान सिर्फ एक तीखा तंज नहीं है, बल्कि यह हम सबको यह सोचने पर मजबूर करने वाला एक आईना है कि जब तक हम माता और पिता की भूमिकाओं को बिना किसी लिंग भेद के बराबरी की नजर से देखना शुरू नहीं करेंगे, तब तक एक सच्चे और समतावादी समाज की कल्पना अधूरी ही रहेगी।