लखनऊ में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का उग्र प्रदर्शन, चुनाव आयोग पर उठे गंभीर सवाल

लखनऊ में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का उग्र प्रदर्शन, चुनाव आयोग पर उठे गंभीर सवाल

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सड़कों पर इन दिनों सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है, जहां विपक्षी दलों के सबसे बड़े मोर्चे यानी समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक बहुत बड़ा और आक्रामक प्रदर्शन किया है। हाथों में तख्तियां लिए, सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ जोरदार नारेबाजी करते हुए हजारों की संख्या में पहुंचे सपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सीधे तौर पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त तत्काल अपने पद से इस्तीफा दें, क्योंकि निष्पक्ष चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने वाली संस्था पर अब सत्ता पक्ष के इशारे पर काम करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिहाज से इस हाई-वोल्टेज प्रदर्शन ने आने वाले चुनावी समीकरणों को पूरी तरह से गरमा दिया है और पुलिस प्रशासन को भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी है।

लखनऊ की सड़कों पर उमड़ा विपक्षी सैलाब और 'मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दो' के गूंजते नारे

राजधानी लखनऊ के प्रमुख चौराहों और चुनाव आयोग कार्यालय के आसपास का इलाका उस वक्त रणक्षेत्र में तब्दील हो गया जब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के नेतृत्व में हजारों कार्यकर्ताओं ने एक साथ मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों का यह गुस्सा इस बात को लेकर था कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को जिस निष्पक्षता और स्वायत्तता के साथ काम करना चाहिए था, उसमें कथित तौर पर भारी गिरावट आ रही है और विपक्षी दलों की शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए जगह-जगह भारी बैरिकेडिंग कर रखी थी, जिसे पार करने के दौरान पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी झड़पें भी देखने को मिलीं। हवा में लहराते झंडे और 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो' के गूंजते नारों ने यह साफ कर दिया कि विपक्ष अब चुनाव आयोग की कार्यशैली के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में पूरी तरह से आ चुका है।

निष्पक्षता पर सवाल और चुनावी धांधली के गंभीर आरोपों से गरमाया राजनीतिक गलियारा

इस प्रदर्शन के दौरान सपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने मीडिया के सामने खुलकर अपनी बात रखी और कहा कि देश में लोकतंत्र की रक्षा करना अब हर नागरिक और राजनीतिक दल का मुख्य कर्तव्य बन गया है। नेताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाओं का जिस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है, उसने देश के आम मतदाताओं के मन में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर एक बहुत बड़ा संदेह पैदा कर दिया है। मतदाता सूचियों में गड़बड़ी, मतदान के दौरान प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग और विपक्षी उम्मीदवारों की शिकायतों को लगातार नजरअंदाज किए जाने जैसे कई गंभीर मुद्दों को इस प्रदर्शन के केंद्र में रखा गया था। विपक्षी दलों का कहना है कि जब तक चुनाव आयोग अपनी कार्यप्रणाली में पूरी तरह से सुधार नहीं लाता और निष्पक्षता का प्रमाण नहीं देता, तब तक उनका यह विरोध प्रदर्शन राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक और अधिक आक्रामक रूप से जारी रहेगा।

पुलिस और प्रशासन की कड़ी चौकसी, ट्रैफिक डायवर्जन और लखनऊ में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

विपक्षी दलों द्वारा आहूत इस बड़े प्रदर्शन को देखते हुए लखनऊ जिला प्रशासन और पुलिस विभाग ने सुरक्षा के बेहद कड़े और चाक-चौबंद इंतजाम किए थे। शहर के संवेदनशील इलाकों, सरकारी दफ्तरों और चुनाव आयोग से जुड़े परिसरों के आसपास सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई थी ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना या उपद्रव से बचा जा सके। प्रदर्शन के कारण शहर के कई मुख्य मार्गों पर लंबा ट्रैफिक जाम लग गया, जिसके चलते आम नागरिकों और यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। हालांकि पुलिस अधिकारियों ने स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए लगातार सूझबूझ का परिचय दिया और प्रदर्शनकारियों को तय सीमा के भीतर ही रोकने का प्रयास किया, लेकिन राजनीतिक दलों के इस उग्र तेवर ने यह साबित कर दिया कि आने वाले दिनों में प्रशासन और विपक्ष के बीच का यह टकराव और अधिक बढ़ सकता है।

देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख और जनता के बीच बढ़ती बहस

लखनऊ में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ किया गया यह जोरदार प्रदर्शन केवल एक स्थानीय राजनीतिक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा संकेत है। जब देश के प्रमुख राजनीतिक दल सीधे तौर पर चुनाव आयोग के मुखिया के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आते हैं, तो यह इस बात को रेखांकित करता है कि सत्ता और विपक्ष के बीच का अविश्वास किस खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। एक मजबूत लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थाएं होती हैं, और उनकी साख को बचाए रखना देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और खुद उन संस्थानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इन तमाम गंभीर आरोपों और विपक्षी दलों के दबाव पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है और क्या देश की राजनीति में यह विवाद किसी बड़े बदलाव की नींव बनता है।