दशहरा खत्म होने के बाद भी पंडाल में ही विराजमान है मां दुर्गा की प्रतिमा, पूजा समिति का सवाल- ये कैसी है व्यवस्था?
दशहरा (विजयादशमी) का पावन पर्व बीत जाने और उत्सव का खुमार उतरने के कई दिनों बाद भी अगर माता रानी की प्रतिमाएं विसर्जन के इंतजार में पूजा पंडालों में ही विराजमान रहें, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा करता है। देश के विभिन्न हिस्सों से हाल ही में एक ऐसा ही झकझोर देने वाला और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने श्रद्धालुओं की आस्था और स्थानीय पूजा समितियों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। विजयादशमी के दिन जहां देश भर में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का गाजे-बाजे के साथ अश्रुपूरित नेत्रों से विसर्जन किया गया, वहीं इस इलाके में नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की घोर लापरवाही के चलते कई दिनों बाद भी मां दुर्गा की आदमकद प्रतिमाएं पंडाल में ही रखी हुई हैं। विसर्जन स्थल पर पानी, सुरक्षा और सुगम रास्तों की उचित व्यवस्था न होने के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। इस पूरी कुव्यवस्था से नाराज और आहत पूजा समितियों ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कड़े शब्दों में सवाल दागा है— "आस्था के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों? आखिर यह कैसी व्यवस्था है?" आइए इस विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट में जानते हैं कि विसर्जन में हो रही इस देरी के पीछे की असली वजह क्या है और पूजा समितियों का क्या रुख है।
विजयादशमी बीत जाने के बाद भी विसर्जन न होना आस्था और परंपराओं पर बड़ा आघात
सनातन परंपरा और हिंदू धर्म मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद दशमी तिथि यानी विजयादशमी के दिन प्रतिमाओं का विसर्जन करना अनिवार्य माना जाता है। विसर्जन की यह प्रक्रिया केवल एक धार्मिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह श्रद्धालुओं की भावनात्मक और आध्यात्मिक भावनाओं से जुड़ी होती है, जहां मां दुर्गा को अगले वर्ष पुनः आने का निमंत्रण देकर विदा किया जाता है। लेकिन इस वर्ष स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार नगर निकाय अधिकारियों की सुस्ती और कुप्रबंधन के कारण विजयादशमी का त्योहार खत्म होने के बावजूद मां दुर्गा की प्रतिमाएं पंडालों में ही रखी रहने को मजबूर हैं। पंडालों में लगे फूल अब सूख चुके हैं, शाम को होने वाली महाआरती का उत्साह फीका पड़ चुका है, और भक्त भारी मन से अपनी कुलदेवी को विसर्जन के इंतजार में देख रहे हैं। धार्मिक गुरुओं और प्रबुद्ध नागरिकों का स्पष्ट मानना है कि तय तिथि के बाद प्रतिमाओं को बिना किसी धार्मिक कारण के पंडाल में रोक कर रखना शास्त्रसम्मत नहीं है और यह श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है।
कृत्रिम तालाबों और विसर्जन घाटों पर फैली गंदगी, पानी की कमी बनी सबसे बड़ी वजह
पूजा समितियों द्वारा उठाए जा रहे सवालों के जवाब में जब विसर्जन घाटों और नदियों के किनारे की जमीनी हकीकत खंगाली गई, तो प्रशासन की तैयारियों की पोल पूरी तरह से खुल गई। एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के कड़े निर्देशों के तहत नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए प्रशासन को कृत्रिम तालाब (Artificial Ponds) और विशेष विसर्जन कुंड तैयार करने थे। लेकिन विसर्जन की तय तारीख तक न तो इन तालाबों में पर्याप्त पानी भरा गया और न ही वहां तक पहुंचने वाले रास्तों की सफाई की गई। विसर्जन स्थल पर भारी कीचड़, जलकुंभी और कचरों का अंबार लगा हुआ था, जिससे भारी-भरकम प्रतिमाओं को पानी में विसर्जित करना पूरी तरह से असंभव और जोखिम भरा हो गया था। जब पूजा समितियां गाजे-बाजे के साथ विसर्जन जुलूस लेकर निकलीं, तो घाटों का भयानक हाल देखकर उन्हें मजबूरन बीच रास्ते से या घाट से वापस लौटकर प्रतिमाओं को पुनः पंडाल में स्थापित करना पड़ा। स्थानीय प्रशासन द्वारा समय रहते इन तैयारियों को पूरा न करना ही इस पूरी अव्यवस्था का सबसे मुख्य कारण बनकर सामने आया है।
पूजा समितियों का फूटा गुस्सा: 'टैक्स हम देते हैं, लेकिन त्योहारों पर मिलती है सिर्फ बदइंतजामी'
प्रशासनिक बदहाली से तंग आकर केंद्रीय और स्थानीय पूजा समितियों ने एकजुट होकर नगर निगम और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। पूजा समिति के अध्यक्ष और पदाधिकारियों का कहना है कि वे हर साल विसर्जन जुलूस और पंडाल निर्माण के लिए पुलिस प्रशासन और नगर निगम से तमाम तरह की अनुमतियां (Permissions) लेते हैं और सरकारी दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन करते हैं। इसके बावजूद हर साल त्योहार के समय प्रशासन की तरफ से आधी-अधूरी तैयारियां ही देखने को मिलती हैं। पूजा समिति के सदस्यों ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि महीनों पहले से बैठकों का दौर चलता है, बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर शून्य काम होता है। अगर विसर्जन घाट तैयार नहीं थे, तो प्रशासन ने पहले से समितियों को सूचित क्यों नहीं किया? अब जब मां दुर्गा की प्रतिमाएं कई दिनों से विसर्जन के बिना पंडाल में खड़ी हैं, तो इसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी आखिर किस अधिकारी की है? पूजा समितियों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अगले 24 घंटे के अंदर विसर्जन की सुचारू व्यवस्था नहीं की गई, तो वे सड़कों पर उतरकर बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
पुलिस और नगर निगम की सफाई: 'जल्द दुरुस्त की जा रही हैं व्यवस्थाएं, कराया जाएगा सुरक्षित विसर्जन'
मामले के तूल पकड़ने और मीडिया व सोशल मीडिया पर बदइंतजामी की तस्वीरें वायरल होने के बाद आखिरकार सो रहा प्रशासनिक अमला हरकत में आ गया है। नगर निगम के उच्च अधिकारियों और पुलिस बल ने विसर्जन स्थलों का दौरा कर स्थिति का जायजा लेना शुरू कर दिया है। अधिकारियों ने अपनी सफाई में कहा कि भारी बारिश या तकनीकी कारणों की वजह से कृत्रिम तालाबों को भरने में थोड़ी देरी हुई थी, जिसे अब युद्धस्तर पर ठीक किया जा रहा है। विसर्जन घाटों पर क्रेन, दमकल की गाड़ियां और गोताखोरों की टीमें तैनात की जा रही हैं ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके। प्रशासनिक दावों के अनुसार, पानी के टैंकरों के जरिए कुंडों को भरा जा रहा है और रास्तों की मरम्मत कराई जा रही है। अधिकारियों ने पूजा समितियों से शांति और सहयोग बनाए रखने की अपील करते हुए आश्वासन दिया है कि बहुत जल्द एक विशेष रूट प्लान बनाकर मां दुर्गा की सभी शेष प्रतिमाओं का पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ सुरक्षित विसर्जन संपन्न करा दिया जाएगा।
भविष्य के लिए सबक: धार्मिक आयोजनों में प्रशासनिक जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी
इस दुखद और निराशाजनक घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि हमारे देश में बड़े धार्मिक आयोजनों और मेलों को लेकर प्रशासनिक तंत्र किस तरह की घोर लापरवाही बरतता है। दशहरा, दुर्गा पूजा और गणेशोत्सव जैसे महापर्व करोड़ों लोगों की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक हैं। ऐसे में विसर्जन जैसी अति-संवेदनशील प्रक्रिया में इतनी बड़ी ढिलाई बरतना प्रशासनिक अक्षमता को दर्शाता है। आम जनता और बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस मामले में केवल सफाई देने या जल्दबाजी में विसर्जन करा देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए जिनकी वजह से भगवान की प्रतिमाएं विसर्जन के इंतजार में अटकी रहीं। जब तक प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हर साल किसी न किसी त्योहार पर श्रद्धालुओं को इस तरह की अव्यवस्था और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता रहेगा। फिलहाल, पूरे क्षेत्र के लोग यही प्रार्थना कर रहे हैं कि मां दुर्गा का विसर्जन शीघ्र और ससम्मान पूरा हो सके।