4 लाख की नौकरी छोड़कर कोल इंडिया के पूर्व GM ने क्यों चुनी क्लासरूम में पढ़ाई की राह? 68 की उम्र में कर रहे Psychology से PG

4 लाख की नौकरी छोड़कर कोल इंडिया के पूर्व GM ने क्यों चुनी क्लासरूम में पढ़ाई की राह? 68 की उम्र में कर रहे Psychology से PG

उम्र सिर्फ एक आंकड़ा होती है और सीखने का कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता, इस बात को सच साबित कर दिखाया है कोल इंडिया के पूर्व जनरल मैनेजर (GM) ने। महीने की ₹4,00,00,0 यानी चार लाख रुपये की शानदार सैलरी, कॉरपोरेट दुनिया की सुख-सुविधाएं, बड़ा औहदा और आरामदेह जिंदगी को हंसते-हंसते अलविदा कहकर इस शख्स ने जो रास्ता चुना है, उसने पूरे देश को हैरान और प्रेरित कर दिया है। 68 वर्ष की उम्र में जहाँ लोग अक्सर सेवानिवृत्ति (Retirement) के बाद शांत और आराम की जिंदगी बिताना पसंद करते हैं, वहीं इन्होंने एक बार फिर से हाथों में किताबें उठाई हैं और कॉलेज के क्लासरूम की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं। इस उम्र में वे युवाओं के बीच बैठकर मनोविज्ञान (Psychology) विषय में अपनी परास्नातक (Post Graduation - PG) की पढ़ाई कर रहे हैं। आखिर इतना बड़ा फैसला लेने और चार लाख रुपये की लग्जरी नौकरी छोड़ने के पीछे उनकी क्या सोच थी? किस बात ने उन्हें इस उम्र में दोबारा छात्र बनने के लिए प्रेरित किया? आइए इस प्रेरणादायक और एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में जानते हैं कोल इंडिया के पूर्व जीएम के इस अनोखे और अद्भुत सफर की पूरी कहानी।

सफलता का शिखर, 4 लाख की सैलरी और फिर अचानक करियर को अलविदा कहने का बड़ा फैसला

कोल इंडिया जैसी प्रतिष्ठित पीएसयू कंपनी में जनरल मैनेजर (GM) के पद तक पहुंचना किसी भी अधिकारी के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। सालों की कड़ी मेहनत, नेतृत्व क्षमता और बेमिसाल कार्यशैली के दम पर उन्होंने इस मुकाम को हासिल किया था। हर महीने करीब ₹4 लाख की सैलरी, सरकारी गाड़ी, नौकर-चाकर और कॉरपोरेट जगत का बड़ा मान-सम्मान उनके पास था। लेकिन जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जब उन्हें महसूस हुआ कि केवल भौतिक सफलताएं और बैंक बैलेंस इंसान को आत्मिक संतुष्टि नहीं दे सकते। उन्होंने देखा कि कॉर्पोरेट की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग तनाव, अवसाद और मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसी विचार ने उनके मन के भीतर एक नया चिराग रोशन किया। उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी शानदार नौकरी और पद से त्यागपत्र देने या रिटायरमेंट के बाद आराम की जिंदगी चुनने के बजाय, समाज के लिए कुछ अलग और नया करने का संकल्प लिया। उनके इस अचानक लिए गए फैसले ने परिवार, दोस्तों और सहकर्मियों को एक पल के लिए चौंका दिया था, लेकिन उनके इरादे इतने मजबूत थे कि कोई भी उनके कदम को रोक नहीं सका।

68 साल की उम्र में क्लासरूम का सफर: युवाओं के साथ बेंच साझा कर पढ़ रहे हैं मनोविज्ञान (Psychology)

जब 68 साल की उम्र में उन्होंने यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया और क्लासरूम में प्रवेश किया, तो वहां का नजारा बेहद अद्भुत था। जहाँ उनके सहपाठी 20 से 22 साल की उम्र के युवा थे, वहीं उनके सिर पर सफेद बाल और चेहरे पर जिंदगी के तजुर्बे की चमक थी। शुरुआत में तो साथी छात्रों और प्रोफेसरों को भी थोड़ा आश्चर्य हुआ कि इतना वरिष्ठ व्यक्ति उनके साथ बैठकर पढ़ाई करेगा। लेकिन अपनी विनम्रता, सीखने की ललक और हंसमुख स्वभाव से उन्होंने बहुत जल्द ही पूरे कॉलेज का दिल जीत लिया। वे हर दिन समय पर कॉलेज पहुंचते हैं, नोट्स बनाते हैं, लाइब्रेरी में घंटों किताबें खंगालते हैं और प्रोफेसरों के लेक्चर्स को बड़े ध्यान से सुनते हैं। मनोविज्ञान (Psychology) जैसे संवेदनशील और गहरे विषय का चयन उन्होंने इसलिए किया ताकि वे इंसान के दिमाग, भावनाओं और व्यवहार को गहराई से समझ सकें। उनका मानना है कि पढ़ाई करने या नया ज्ञान हासिल करने की कोई समय सीमा नहीं होती, जब आपका मन कहे तब से ही एक नई शुरुआत की जा सकती है।

क्यों चुना Psychology का रास्ता? मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज को देना चाहते हैं नया संदेश

इस उम्र में साइकोलॉजी से पीजी करने के पीछे उनका मकसद केवल एक डिग्री हासिल करना नहीं है, बल्कि समाज सेवा की एक बहुत बड़ी सोच छिपी हुई है। आज के दौर में जहां हर उम्र का व्यक्ति मानसिक तनाव, डिप्रेशन, अकेलापन और पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहा है, वहीं वे इस डिग्री के जरिए लोगों की काउंसलिंग करना चाहते हैं। उनका कहना है कि आज भारत में शारीरिक बीमारियों का इलाज तो हर कोई करवा लेता है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर खुलकर बात करने से लोग कतराते हैं। अपनी इस पढ़ाई के पूरा होने के बाद वे बुजुर्गों, युवाओं और कॉरपोरेट कर्मचारियों के लिए मुफ्त काउंसलिंग सेशन आयोजित करने की योजना बना रहे हैं। वे समाज को यह संदेश देना चाहते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना घातक हो सकता है और सही समय पर सही मार्गदर्शन किसी की भी बिखरती जिंदगी को संवार सकता है।

'सीखने की कोई उम्र नहीं होती': आज के युवाओं के लिए मिसाल बने पूर्व कोल इंडिया जीएम

कोल इंडिया के पूर्व जीएम का यह प्रेरणादायक सफर आज देश के लाखों-करोड़ों युवाओं के लिए एक जिंदादिली का मिसाल बन चुका है। जो युवा छोटी-छोटी असफलताओं से निराश होकर हार मान लेते हैं या जिन्हें लगता है कि एक उम्र के बाद जिंदगी की राहें बंद हो जाती हैं, उनके लिए यह कहानी किसी ऊर्जा पुंज से कम नहीं है। 68 वर्ष की आयु में उनका यह जुनून यह साबित करता है कि अगर आपके भीतर कुछ सीखने की ललक और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो उम्र की कोई भी सीमा आपको रोक नहीं सकती। सोशल मीडिया पर भी उनके इस फैसले और जज्बे की जमकर तारीफ हो रही है। लोग कह रहे हैं कि 4 लाख रुपये की नौकरी छोड़ना आसान नहीं होता, लेकिन जब लक्ष्य पैसों से परे समाज सुधार का हो, तो इंसान ऐसे बड़े कदम आसानी से उठा लेता है।

आगे की क्या है योजना? डिग्री के बाद समाज सेवा में पूरी तरह समर्पित होने का संकल्प

अपनी परास्नातक (PG) की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे केवल यहीं नहीं रुकने वाले हैं। उनकी योजना मनोविज्ञान के क्षेत्र में आगे रिसर्च करने और अपनी एक एनजीओ (NGO) या काउंसलिंग सेंटर की शुरुआत करने की है। वे विशेष रूप से उन बुजुर्गों की मदद करना चाहते हैं जो सेवानिवृत्ति के बाद अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं। उनका मानना है कि भारत की वृद्ध आबादी को आज सबसे ज्यादा भावनात्मक सहारे की जरूरत है। उनका यह प्रयास निश्चित रूप से समाज में एक बड़ा बदलाव लाएगा। उनकी यह कहानी हम सभी को सिखाती है कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने का कोई सही या गलत वक्त नहीं होता। जब भी आप अपने सपनों की ओर कदम बढ़ाते हैं, वही वक्त आपकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत मोड़ बन जाता है।