जमीन सिर्फ एक आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की मूल पहचान है: IRS निशा उरांव

जमीन सिर्फ एक आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की मूल पहचान है: IRS निशा उरांव

भारत के आदिवासी समाज और उनकी विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं और जीवनशैली में 'जमीन' का महत्व केवल एक मिट्टी के टुकड़े या खेती-किसानी के साधन भर का नहीं होता, बल्कि वह उनकी रूह, उनकी पीढ़ियों के इतिहास और उनकी संपूर्ण अस्मिता का आधार होती है। इसी अकाट्य सत्य को रेखांकित करते हुए देश की जानी-मानी आईआरएस (IRS) अधिकारी और आदिवासी समाज की मुखर प्रखर वक्ता निशा उरांव (Nisha Oraon) ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आदिवासियों के लिए जमीन केवल कोई भौतिक संसाधन या संपत्ति नहीं है, बल्कि यह उनकी पहचान और अस्तित्व का पर्याय है। निशा उरांव के इस बयान ने एक बार फिर झारखंड और देश के अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भूमि अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत को लेकर एक नई और सार्थक बहस छेड़ दी है।

क्या है पहनई और मुंडारी जमीन का ऐतिहासिक महत्व और उसकी परंपरा?

झारखंड की पारंपरिक शासन व्यवस्था में जमीन के बंटवारे और उसके उपयोग को लेकर बेहद अनूठी और पुश्तैनी व्यवस्थाएं चली आ रही हैं। इनमें 'पहनई' (Pahnai) और 'मुंडारी' (Mundari Khuntkatti) भूमि का विशेष स्थान है। पारंपरिक आदिवासी संस्कृति के अनुसार, जब गांवों का गठन हुआ और जंगलों को साफ करके कृषि योग्य भूमि तैयार की गई, तो अलग-अलग जिम्मेदारियों के लिए जमीनें तय की गईं। पहनई की जमीन उस व्यक्ति या परिवार को सौंपी जाती है जो गांव के धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ, प्रकृति की वंदना और सामाजिक संस्कारों को निभाने वाले धार्मिक प्रधान यानी 'पहन' की भूमिका निभाता है। इसी तरह मुंडारी खूंटकट्टी व्यवस्था के तहत उन मूल आदिवासियों के अधिकार सुरक्षित किए गए जिन्होंने सबसे पहले उस भूमि को उपजाऊ बनाया था। इन जमीनों का मूल स्वरूप यह है कि ये विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत मुनाफे या कमर्शियल इस्तेमाल के लिए नहीं होतीं, बल्कि समाज के प्रति निष्ठा और कर्तव्य का प्रतीक होती हैं।

सेवा के बदले मिलती है जमीन, अधिकार के साथ जुड़े होते हैं कड़े सामाजिक कर्तव्य

IRS निशा उरांव ने अपने संबोधन और चर्चाओं में इस बात पर विशेष जोर दिया कि पहनई और मुंडारी जैसी पारंपरिक जमीनें किसी को मुफ्त में या यूं ही भोग-विलास के लिए नहीं दी जाती हैं, बल्कि यह विशुद्ध रूप से 'सेवा के बदले' (In Return for Service) दी जाने वाली व्यवस्था है। जब तक कोई व्यक्ति या परिवार समाज, गांव और परंपराओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाता है, तब तक वह उस जमीन का संरक्षक और उपयोगकर्ता रहता है। यह व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी समाज में अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू रहे हैं। आधुनिकता और शहरीकरण की अंधी दौड़ में जहां लोग जमीनों को सिर्फ खरीदने और बेचने की एक वस्तु मानने लगे हैं, वहीं आदिवासी परंपराएं आज भी यह सिखाती हैं कि जमीन के साथ एक नैतिक और सांस्कृतिक बंधन जुड़ा होता है।

आधुनिक विकास के दौर में आदिवासी भूमि संरक्षण की गंभीर चुनौतियां और भविष्य की राह

आज के इस दौर में जब औद्योगीकरण, शहरी विस्तार, खनन और कॉर्पोरेट विकास के नाम पर आदिवासी जमीनों का अधिग्रहण तेजी से हो रहा है, तब निशा उरांव जैसी शख्सियतों द्वारा ऐसे मुद्दों को उठाना बेहद प्रासंगिक हो जाता है। चिंता की बात यह है कि लालच और प्रशासनिक कमियों के चलते कई जगहों पर इन पारंपरिक और संरक्षति जमीनों के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की कोशिशें की जाती हैं, जिससे आदिवासी समाज की मूल संस्कृति खतरे में पड़ जाती है। जानकारों का मानना है कि यदि जल, जंगल और जमीन की इस अनूठी संस्कृति को नहीं बचाया गया, तो आदिवासी समाज की जड़ें हिल जाएंगी। निशा उरांव का यह संदेश न केवल प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर बल्कि सामाजिक स्तर पर भी हर नागरिक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि आदिवासियों की जमीन बचाना दरअसल उनकी संस्कृति और इस देश की मूल विविधता को बचाना है।