पूर्वोत्तर की सियासत में राहुल गांधी का बड़ा दांव, मास्टरमाइंड सियासी चाल

पूर्वोत्तर की सियासत में राहुल गांधी का बड़ा दांव, मास्टरमाइंड सियासी चाल

 

देश के पूर्वोत्तर राज्य असम और आसपास के इलाकों में नागरिकता अधिकारों, एनआरसी (NRC) और सीएए (CAA) से जुड़े मुद्दों पर पिछले कई सालों से लगातार आंदोलन चलाए जा रहे हैं। इन आंदोलनों के बीच हाल ही में एक ऐसा बड़ा सियासी घटनाक्रम देखने को मिला है जिसने पूरे असम और राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका कर रख दिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के फायरब्रांड नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) द्वारा निकाले जा रहे हालिया विरोध प्रदर्शनों (Protests) और यात्राओं में क्षेत्र की जानी-मानी मानवाधिकार कार्यकर्ता और सीजेपी (Citizens for Justice and Peace - CJP) आंदोलन से जुड़ी प्रमुख चेहरा नेहा बोरा (Neha Bora) की सक्रिय भागीदारी देखी गई। इसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में यह सवाल बहुत तेजी से तैरने लगा है कि क्या राहुल गांधी ने नागरिकता और क्षेत्रीय आंदोलनों के इस बड़े जनाधार को सीधे तौर पर कांग्रेस के पक्ष में मोड़ने की एक बेहद सोची-समझी और रणनीतिक सियासी चाल चल दी है?

कौन हैं नेहा बोरा और सीजेपी आंदोलन में क्यों माना जाता है उनका इतना अहम रोल?

असम और पूर्वोत्तर भारत में सीजेपी यानी सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस एक ऐसा नागरिक संगठन है जिसने एनआरसी की जटिल प्रक्रियाओं, विदेशी न्यायाधिकरणों (Foreigners Tribunals) के कानूनी झमेलों और सीमांत इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के नागरिकता अधिकारों की लड़ाई कानूनी और सामाजिक स्तर पर पूरी शिद्दत से लड़ी है। इस पूरे अभियान में नेहा बोरा एक अग्रणी और प्रभावशाली युवा आवाज बनकर उभरी थीं। उन्होंने धरातल पर जाकर पीड़ित परिवारों को कानूनी सहायता पहुंचाने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए एक बड़ा जन-समर्थन जुटाया था। सीजेपी जैसे गैर-राजनीतिक माने जाने वाले नागरिक अधिकार मंचों का पूर्वोत्तर के जमीनी मतदाताओं और खासकर हाशिए पर मौजूद वर्गों के बीच बहुत गहरा प्रभाव रहा है। ऐसे में नेहा बोरा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के मंच पर आना असम के इस सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के भविष्य को लेकर कई नए सवाल खड़े कर रहा है।

विरोध प्रदर्शन में नेहा बोरा की मौजूदगी और कांग्रेस की नई पूर्वोत्तर रणनीति

जब राहुल गांधी के नेतृत्व में असम में नागरिक अधिकारों, महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय मुद्दों को लेकर विशाल विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया, तो मंच और रैली की अग्रिम पंक्ति में नेहा बोरा की उपस्थिति ने सबका ध्यान खींचा। विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी असम में अपनी पुरानी खोई हुई जमीन को वापस पाने के लिए एक त्रिस्तरीय रणनीति पर काम कर रही है। पहली strategy यह है कि राज्य के गैर-राजनीतिक जन-आंदोलनों के प्रमुख चेहरों को अपनी ओर आकर्षित किया जाए। दूसरी बात, क्षेत्रीय अस्मिता और नागरिकता के संवेदनशील मुद्दों पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बैकफुट पर धकेला जाए। तीसरी और सबसे बड़ी रणनीति यह है कि सीजेपी जैसे स्वतंत्र और नागरिक-केंद्रित आंदोलनों के कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के बैनर तले लाकर उनके पारंपरिक वोट बैंक को फिर से अपने पाले में एकजुट किया जाए।

क्या आंदोलनों के बिखराव से सत्ताधारी दल को मिलेगी चुनौती या कांग्रेस होगी मजबूत?

राहुल गांधी के इस कदम के बाद राजनीतिक समीक्षकों के दो अलग-अलग धड़े बन गए हैं। एक वर्ग का मानना है कि नागरिक समाज के प्रमुख कार्यकर्ताओं का किसी एक राजनीतिक दल के साथ सीधे तौर पर जुड़ना मूल आंदोलनों के निष्पक्ष स्वरूप को प्रभावित कर सकता है। सीजेपी जैसे प्लेटफॉर्म्स के कई समर्थकों का मानना है कि आंदोलनों को गैर-राजनीतिक ही रहना चाहिए ताकि वे सत्ता में बैठी किसी भी सरकार से बेखौफ होकर सवाल पूछ सकें। वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस समर्थकों का दावा है कि जब तक कोई मजबूत राजनीतिक विकल्प और राष्ट्रीय पार्टी नागरिक अधिकारों की लड़ाई को अपने एजेंडे में शामिल नहीं करेगी, तब तक संसद से लेकर सड़क तक इन आंदोलनों की आवाज को दबाया जाता रहेगा। राहुल गांधी द्वारा नेहा बोरा जैसे जमीनी एक्टिविस्टों को जोड़ने से असम में बीजेपी विरोधी वोटों का बिखराव रुकेगा और विपक्षी गठबंधन को एक नया और मजबूत आधार मिलेगा।

असम की आने वाली राजनीति और नए बनते सियासी समीकरणों पर सबकी निगाहें

असम की राजनीति हमेशा से ही जातीय अस्मिता, नागरिकता के कानूनी पैमानों और सीमावर्ती क्षेत्रों के जटिल सामाजिक ताने-बाने के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राहुल गांधी द्वारा नेहा बोरा को अपने आंदोलन और रैलियों में प्रमुखता देना इस बात का साफ संकेत है कि कांग्रेस अब केवल दलीय राजनीति के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि वह राज्य के हर छोटे-बड़े जन-आंदोलन की ताकत को समेटकर एक विशाल राजनीतिक बवंडर खड़ा करने की योजना बना रही है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और निर्णायक होगा कि सीजेपी और अन्य स्थानीय नागरिक आंदोलनों से जुड़े लोग इस सियासी फेरबदल को किस नजरिए से देखते हैं और क्या यह मास्टरस्ट्रोक असम की सत्ता पर काबिज सत्तारूढ़ दल के लिए वाकई कोई बड़ी चुनौती खड़ी कर पाता है या नहीं।