भारत के ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात ने अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में मचाई सनसनी
वैश्विक रक्षा और सामरिक बाजार में इन दिनों भारत का बोलबाला लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम से तैयार की गई दुनिया की सबसे घातक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' (BrahMos) ने अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सामरिक समीकरणों में एक नया भूचाल ला दिया है। फिलीपींस जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश को ब्रह्मोस की सफलतापूर्वक पहली खेप सौंपने और दुनिया के कई अन्य देशों के साथ चल रही रक्षा सौदों की वार्ताओं ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब केवल अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने वाला देश नहीं, बल्कि दुनिया का एक प्रमुख रक्षा निर्यातक देश बन चुका है। भारत के इस बढ़ते रक्षा प्रभाव और रणनीतिक कूटनीति ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यप एर्दोगन और उनके सदाबहार पाकिस्तानी दोस्तों की नींद उड़ा दी है।
तुर्की और पाकिस्तान की बढ़ती बेचैनी के पीछे की असली सामरिक वजह क्या है?
पिछले कुछ वर्षों से तुर्की, पाकिस्तान के साथ मिलकर रक्षा, ड्रोन तकनीक और रणनीतिक मंचों पर भारत के खिलाफ मुखर होकर बयानबाजी करता रहा है। खासकर कश्मीर और क्षेत्रीय मामलों में तुर्की द्वारा पाकिस्तान को खुलेआम समर्थन दिए जाने के कारण दोनों देशों के बीच एक अलग ही रक्षा गठजोड़ बनता दिख रहा था। लेकिन अब जैसे-जैसे भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र देशों को ब्रह्मोस जैसी अचूक और मारक मिसाइलें सप्लाई करनी शुरू की हैं, उससे भू-राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं। तुर्की के रक्षा विश्लेषक और मीडिया इस बात से सहमे हुए हैं कि भारत की यह अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक हिंद महासागर और उससे लगे एशियाई समुद्री रास्तों पर भारत को एक ऐसा रणनीतिक बढ़त दिला रही है जिसे चाहकर भी तुर्की और पाकिस्तान मिलकर काउंटर नहीं कर पा रहे हैं।
ब्रह्मोस की मारक क्षमता और डिफेंस मार्केट में भारत की बढ़ती धमक
ब्रह्मोस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसकी सुपरसोनिक रफ्तार (Mach 2.8 से 3), 'पिक-एंड-चूज' सटीकता और कम ऊंचाई पर उड़कर दुश्मन के रडार को चकमा देने की अद्भुत क्षमता है। थल, जल और आकाश तीनों जगहों से दागे जाने वाले इस ब्रह्मांड के सबसे तेज क्रूज वेपन ने चीन और पाकिस्तान की सरहदों पर पहले ही खलबली मचा रखी थी, लेकिन अब इसके निर्यात होने से वैश्विक रक्षा मंच पर भारत की साख आसमान छू रही है। वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया और कई मध्य-पूर्वी तथा अफ्रीकी देश भी भारत के साथ ब्रह्मोस और अन्य रक्षा उपकरणों को खरीदने के लिए कतार में खड़े हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी देश के पास इस स्तर की मारक और स्वदेशी-तकनीक आधारित मिसाइल प्रणाली होती है, तो उसके विरोधी स्वाभाविक रूप से कूटनीतिक दबाव में आ जाते हैं।
तुर्की के लिए आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर क्यों बढ़ रही है बड़ी मुसीबत?
तुर्की खुद को आधुनिक हथियारों और ड्रोन्स (Bayraktar Drones) के जरिए वैश्विक रक्षा बाजार में एक बड़ा खिलाड़ी साबित करने की कोशिश में लगा रहता है, लेकिन भारत के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और 'मेक इन इंडिया' विजन के आगे अब तुर्की के कई हथियारों की चमक फीकी पड़ती नजर आ रही है। इसके अलावा, भारत ने जिस तरह से पश्चिमी एशिया और खाड़ी देशों (जैसे यूएई और सऊदी अरब) के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया है, उससे तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की उस क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा को करारा झटका लगा है जिसके तहत वे खुद को इस्लामिक दुनिया का अगुआ दिखाने की कोशिश करते हैं। पाकिस्तान का हर कदम पर साथ देने वाला तुर्की अब यह अच्छी तरह समझ चुका है कि भारत की बढ़ती सैन्य और आर्थिक ताकत के सामने उसकी क्षेत्रीय कूटनीति अब ज्यादा दिनों तक टिकने वाली नहीं है।
भविष्य के भू-राजनीतिक समीकरण और भारत का बढ़ता डिफेंस विजन
भारत का यह ब्रह्मोस दांव केवल एक हथियार की बिक्री का सौदा नहीं है, बल्कि यह भारत की उस बड़ी विदेश नीति का हिस्सा है जिसके तहत वह अपने मित्र देशों को सुरक्षा का भरोसा दिलाते हुए विरोधी ताकतों और उनके साझीदारों को स्पष्ट संदेश दे रहा है। आने वाले समय में जैसे-जैसे भारत अपने रक्षा निर्यात के लक्ष्यों को आगे बढ़ाएगा, वैसे-वैसे पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों की सामरिक मुश्किलें और अधिक बढ़ती चली जाएंगी। भारत ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि कूटनीति और रक्षा के मोर्चे पर आत्मनिर्भर भारत अब किसी भी चुनौती का जवाब अपनी शर्तों पर देने में पूरी तरह सक्षम है।