किरेन रिजिजू का खरगे को पत्र, बोले- महत्वपूर्ण कानूनों में रोड़ा न बने कांग्रेस

किरेन रिजिजू का खरगे को पत्र, बोले- महत्वपूर्ण कानूनों में रोड़ा न बने कांग्रेस

भारतीय संसद और राष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों परिसीमन संशोधन विधेयक (Delimitation Amendment Bill) को लेकर सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। इस संवेदनशील और देश के भविष्य को तय करने वाले महत्वपूर्ण विधायी मुद्दे पर केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू (Kiren Rijiju) ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) को एक तीखा और बेहद स्पष्ट संदेश देते हुए पत्र लिखा है। इस पत्र के माध्यम से किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पार्टी और विपक्ष से अपील की है कि वे देश के हित से जुड़े इस अहम और दूरगामी कानून को पारित कराने में सहयोग करें और राजनीतिक स्वार्थ के चलते इसमें किसी भी प्रकार का अनावश्यक रोड़ा या व्यवधान पैदा न करें। मंत्री के इस पत्र के सामने आने के बाद देश की राजधानी दिल्ली से लेकर विभिन्न राज्यों के राजनीतिक हलकों में जुबानी जंग और तेज हो गई है।

किरेन रिजिजू के पत्र के मुख्य बिंदु: राष्ट्रीय हित और संवैधानिक प्रक्रियाओं का दिया हवाला

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा मल्लिकार्जुन खरगे को भेजे गए इस आधिकारिक पत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि परिसीमन की प्रक्रिया देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने और विभिन्न राज्यों में निर्वाचन क्षेत्रों के सही प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए कितनी आवश्यक है। रिजिजू ने पत्र में लिखा कि इस तरह के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विधेयकों पर राजनीति करने के बजाय सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर आकर देश के लोकतांत्रिक संस्थानों को सशक्त बनाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं और संसद के कामकाज में बाधा डालने का प्रयास कर रहे हैं, जो देश के संसदीय इतिहास और संघवाद की भावना के अनुकूल नहीं है। सरकार चाहती है कि इस विधेयक पर संसद में स्वस्थ और सार्थक चर्चा हो, न कि व्यवधान पैदा करके सदन का समय बर्बाद किया जाए।

परिसीमन विधेयक पर क्यों मचा है सियासी बवाल? दक्षिण और उत्तर के राज्यों के बीच बढ़ती रस्साकशी

आखिर क्यों परिसीमन संशोधन विधेयक को लेकर देश की राजनीति में इतना भारी भूचाल आया हुआ है? इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि परिसीमन प्रक्रिया के तहत लोकसभा सीटों का पुनर्गठन होना है। दक्षिण भारत के कई राज्यों की यह बड़ी चिंता रही है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण (Population Control) के कार्यक्रमों को बेहद सख्ती और सफलता के साथ लागू किया है, यदि उनके आधार पर सीटों का निर्धारण किया गया, तो उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व मिल सकता है, जबकि उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं। इसी क्षेत्रीय असंतुलन और आशंकाओं को आधार बनाकर कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल इस विधेयक के कुछ प्रावधानों पर लगातार आपत्ति जता रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि सरकार को सभी राज्यों के हितों का संतुलन बनाते हुए ही इस पर कोई भी अंतिम निर्णय लेना चाहिए।

कांग्रेस और विपक्षी दलों का रुख: सरकार पर मनमाने तरीके से कानून थोपने का आरोप

मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य विपक्षी नेताओं का यह तर्क रहा है कि केंद्र सरकार बिना किसी व्यापक और पारदर्शी सर्वदलीय सहमति के जल्दबाजी में ऐसे महत्वपूर्ण कानून पारित कराना चाहती है जो देश की संघीय संरचना (Federal Structure) को प्रभावित कर सकते हैं। विपक्ष का आरोप है कि संसद के भीतर संवाद और चर्चा के अवसरों को दबाया जा रहा है और तानाशाही रवैये से बिल पास कराए जा रहे हैं। इसी गतिरोध के चलते संसद के सत्रों में लगातार हंगामा देखने को मिल रहा है। कांग्रेस पार्टी का यह रुख है कि जब तक सभी क्षेत्रीय दलों की आशंकाओं का पूरी तरह से समाधान नहीं किया जाता, तब तक इस संवेदनशील विधेयक को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए, क्योंकि यह देश की एकता और विविधता से जुड़ा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील विषय है।

सरकार की दो टूक चेतावनी, देश के विकास और लोकतांत्रिक सुधारों के लिए विधेयक जरूरी

विपक्ष के तमाम विरोध और हंगामे के बीच किरेन रिजिजू और केंद्र सरकार के अन्य वरिष्ठ मंत्रियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश को आधुनिक और पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था देने के लिए परिसीमन और अन्य चुनावी सुधार आवश्यक हैं। सरकार का यह मानना है कि विकास और प्रतिनिधित्व के पैमाने पर हर नागरिक को उसका अधिकार मिलना चाहिए और किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। मंत्री का यह पत्र इस बात का संकेत है कि सरकार इस विधेयक को लेकर पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है और संसद सत्र के दौरान इस पर कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार विपक्ष को साधने में कामयाब होती है या यह राजनीतिक टकराव संसद के गलियारों से निकलकर सड़क की लड़ाई का रूप ले लेता है।