क्या होता है मां दुर्गा का खोइछा और कैसे भरा जाता है? जानें सही नियम
शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर मां दुर्गा की विदाई और नवमी-दशमी की तिथियों पर खोइछा भरने की एक बेहद प्राचीन, पवित्र और भावनात्मक परंपरा निभाई जाती है। पूर्वी भारत, विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह परंपरा हर घर और पूजा पंडालों में बड़े ही धूमधाम तथा भक्ति भाव के साथ मनाई जाती है। सनातन धर्म में बेटी को ससुराल विदा करते समय जिस प्रकार खोइछा देने का रिवाज है, ठीक उसी प्रकार मां जगदम्बा को भी अपने घर की बेटी मानकर खोइछा भरकर विदाई दी जाती है। इस पावन अनुष्ठान का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत बड़ा महत्व माना गया है, जिसे सही विधि-विधान और नियमों के अनुसार करना अत्यंत फलदायी माना जाता है और इससे घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है।
मां दुर्गा का खोइछा क्या है और इसका पौराणिक तथा धार्मिक महत्व
खोइछा मुख्य रूप से सौभाग्य, समृद्धि और वात्सल्य का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब मां दुर्गा नवरात्रि के नौ दिनों तक अपने मायके यानी पृथ्वी लोक पर अपने भक्तों کے बीच रहने आती हैं, तो भक्तजन पूरे भाव से उनकी सेवा करते हैं। विजयदशमी के दिन जब मां वापस अपने ससुराल यानी कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के पास लौटने लगती हैं, तो उन्हें खाली हाथ विदा नहीं किया जाता। जैसे एक मां अपनी बेटी के सुखद और अखंड सौभाग्यशाली वैवाहिक जीवन की कामना के लिए उसकी साड़ी के आंचल में चावल, दूर्वा, हल्दी और सुहाग की सामग्री बांधती है, ठीक उसी तरह मां दुर्गा को भी खोइछा दिया जाता है। माना जाता है कि जो भी महिला पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ मां दुर्गा का खोइछा भरती है, उसके घर में कभी भी धन-धान्य और सुख-शांति की कमी नहीं होती है।
खोइछा भरने के लिए आवश्यक शुभ सामग्री: इन चीजों का होना है बेहद जरूरी
मां दुर्गा का खोइछा भरने से पहले सभी आवश्यक और पवित्र सामग्रियों को एक स्थान पर एकत्र कर लेना चाहिए। शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार, खोइछा की सामग्री में शुद्धता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके लिए नई लाल या पीले रंग की चुरी अथवा साड़ी का आंचल इस्तेमाल किया जाता है। मुख्य सामग्रियों में अक्षत यानी बिना टूटे हुए साबुत अरवा चावल, खड़ी हल्दी की गांठ, दूर्वा यानी दूब घास, बताशा या गुड़, सिंदूर, सिंदूर की डिब्बी, कौड़ी, सिक्के, हरी सुपारी और सुहाग का सामान जैसे लाल चूड़ियां, बिंदी और आलता शामिल होता है। चावल समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जबकि हल्दी और दूर्वा जीवन में आरोग्य और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं, जिससे इस पूरी प्रक्रिया का धार्मिक प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।
मां दुर्गा का खोइछा भरने की सही और प्रामाणिक विधि-विधान
खोइछा भरने की प्रक्रिया को हमेशा शुभ मुहूर्त में और पूर्ण पवित्रता के साथ संपन्न किया जाना चाहिए। सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं। इसके बाद अपने आंचल या एक नई लाल चुन्नी में सबसे पहले थोड़ा अक्षत यानी चावल रखें। फिर उसमें हल्दी की गांठ, सुपारी, सिक्के, दूर्वा, बताशा और सुहाग की सभी सामग्री डालें। अब इस सामग्री को मां दुर्गा की प्रतिमा के आंचल में तीन बार या पांच बार धीरे-धीरे समर्पित करें। इस दौरान मां के ध्यान मंत्रों का निरंतर जाप करते रहना चाहिए। खोइछा समर्पित करने के बाद मां के चरणों का स्पर्श कर सिंदूर लगाएं और उस सिंदूर को अपनी मांग में भी लगाएं। अंत में मां से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करते हुए भूल-चूक के लिए क्षमा याचना करें।
खोइछा भरने के समय ध्यान रखने योग्य जरूरी नियम और सावधानियां
मां दुर्गा का खोइछा भरते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अनिवार्य माना गया है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। सबसे पहली बात यह है कि खोइछा में इस्तेमाल किए जाने वाले चावल पूरी तरह से साबुत होने चाहिए, टूटे हुए चावलों का प्रयोग वर्जित है। खोइछा भरने का अधिकार मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं को होता है, लेकिन कन्याएं भी मां के आशीर्वाद के लिए चावल और मिष्ठान अर्पित कर सकती हैं। खोइछा समर्पित करने के बाद जो चावल या सामग्री बच जाती है अथवा मां के प्रसाद रूप में मिलती है, उसे घर के अन्न भंडार या तिजोरी में संभाल कर रखना चाहिए। इसे फेंकना या अनादर करना बेहद अशुभ माना जाता है। इस पवित्र रीति-रिवाज से घर में सदैव अन्नपूर्णा मां का वास बना रहता है और नकारात्मक ऊर्जाएं हमेशा के लिए दूर हो जाती हैं।