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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : देश की सर्वोच्च अदालत ने बुधवार (11 मार्च, 2026) को मानवीय संवेदनाओं और व्यक्तिगत गरिमा से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद निवासी हरीश राणा की 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' (Passive Euthanasia) की याचिका को स्वीकार करते हुए उनकी चिकित्सा सहायता प्रणाली (Life Support) को हटाने का आदेश दिया है। 13 वर्षों से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े हरीश के परिवार के लिए यह फैसला किसी बड़ी राहत से कम नहीं है।

हादसे ने छीनी थी जिंदगी: 13 साल का लंबा इंतजार

हरीश राणा कभी एक होनहार छात्र थे, लेकिन कॉलेज के दिनों में हुई एक दर्दनाक दुर्घटना ने सब कुछ बदल दिया। सिर में लगी गंभीर चोट के कारण उनके मस्तिष्क को भारी नुकसान पहुँचा था। पिछले 13 वर्षों से वे बिस्तर पर थे और उनका जीवन पूरी तरह से कृत्रिम चिकित्सा प्रणालियों पर निर्भर था। मेडिकल रिपोर्टों के आधार पर अदालत ने माना कि इतने लंबे समय में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है और भविष्य में भी ठीक होने की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: 'मरीज का हित सर्वोपरि'

न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जब कोई मरीज स्वयं निर्णय लेने की स्थिति में न हो, तो उसके निकटतम परिजनों को उसके सर्वोत्तम हित में फैसला लेने का अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मरीज को केवल मशीनों के सहारे जीवित रखना तभी तर्कसंगत है जब उपचार से लाभ की उम्मीद हो। जस्टिस परदीवाला ने 2018 के ऐतिहासिक 'कॉमन कॉज' फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जीवन और मृत्यु के बीच मानवीय गरिमा को बनाए रखना अनिवार्य है।

प्रक्रिया में बड़े बदलाव: 30 दिन की समीक्षा अवधि खत्म

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रक्रियात्मक देरी को कम करने का प्रयास किया है। कोर्ट ने अनिवार्य 30 दिनों की समीक्षा अवधि (Review Period) की शर्त को हटा दिया है। आदेश के अनुसार, हरीश को दिल्ली के एम्स (AIIMS) में भर्ती कराया जाएगा जहाँ सभी कानूनी और चिकित्सकीय औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चिकित्सा उपचार को चरणबद्ध और मानवीय तरीके से बंद किया जाना चाहिए।

भविष्य के लिए नए दिशा-निर्देश तय

अदालत ने भविष्य के समान मामलों के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया है। पीठ ने कहा कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु की यह प्रक्रिया केवल अस्पताल तक सीमित रखना जरूरी नहीं है; यदि परिवार चाहे और डॉक्टर अनुमति दें, तो इसे घर पर भी संपन्न किया जा सकता है। न्यायाधीशों ने इस बात पर जोर दिया कि हर मनुष्य को गरिमा के साथ जीने और गरिमा के साथ मृत्यु वरण करने का संवैधानिक अधिकार है।