दुनिया के किस देश में सरकार से सवाल कर सकते हैं युवा? UN की रिपोर्ट पर भारत ने जताया कड़ा ऐतराज

दुनिया के किस देश में सरकार से सवाल कर सकते हैं युवा? UN की रिपोर्ट पर भारत ने जताया कड़ा ऐतराज

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक बार फिर भारत और संयुक्त राष्ट्र (UN) के बीच वैचारिक और कूटनीतिक तनातनी देखने को मिली है, जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र की एक विवादित रिपोर्ट पर बेहद कड़ा ऐतराज जताया है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था द्वारा युवाओं और शासन प्रणाली को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गई थी, जिसमें दुनिया भर के देशों में युवाओं द्वारा सरकारों की नीतियों पर सवाल उठाने और विरोध प्रदर्शन करने के अधिकारों को रेखांकित किया गया था। इस रिपोर्ट के आने के बाद से ही वैश्विक कूटनीति हलकों में बहस छिड़ गई है कि क्या दुनिया के सभी देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं एक जैसी हैं और क्या युवाओं को अपनी सरकारों से सवाल करने की पूरी छूट होनी चाहिए? इसी संदर्भ में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से इस रिपोर्ट के कुछ पहलुओं पर कड़ी आपत्ति जताते हुए अपनी संप्रभुता और लोकतांत्रिक मूल्यों का पुरजोर पक्ष रखा है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में युवाओं के अधिकारों और सरकारी जवाबदेही का जिक्र

संयुक्त राष्ट्र की इस चर्चित रिपोर्ट में मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया है कि आज के आधुनिक दौर में युवा अपनी सरकारों से किस प्रकार संवाद स्थापित कर रहे हैं और नीति निर्माण में उनकी भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया था कि कई विकासशील और विकसित देशों में युवाओं को अपनी सरकारों से तीखे सवाल पूछने, प्रशासनिक फैसलों पर पारदर्शिता की मांग करने और अपनी असहमति जताने के लिए सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए। रिपोर्ट के इन बिंदुओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और कुछ पश्चिमी देशों ने तो इसका समर्थन किया, लेकिन भारत जैसे विशाल और बहुसांस्कृतिक लोकतांत्रिक देश ने इसके पीछे छिपे अंतर्निहित एजेंडे और पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भारत ने क्यों जताई कड़ी आपत्ति? संप्रभुता और घरेलू कानूनों का दिया हवाला

संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधियों ने इस रिपोर्ट पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा, जीवंत और पारदर्शी लोकतंत्र है जहां संविधान ने हर नागरिक और युवा को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करने की पूरी स्वतंत्रता दी है। हालांकि, भारत का तर्क यह है कि इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें अक्सर जमीनी हकीकत को समझे बिना और स्थानीय सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के आयामों की अनदेखी करते हुए तैयार की जाती हैं। भारतीय पक्ष का मानना है कि असहमति और विरोध के नाम पर कुछ बाहरी तत्व या भ्रामक ताकतें युवाओं को गुमराह करने की कोशिश करती हैं, और ऐसी रिपोर्टें देश की आंतरिक व्यवस्था में अनुचित हस्तक्षेप का जरिया बन सकती हैं। भारत ने दो टूक शब्दों में यह संदेश दिया है कि देश की शासन प्रणाली और युवा नीति को लेकर किसी भी बाहरी या अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा तय किए गए एकतरफा पैमाने स्वीकार्य नहीं हैं।

लोकतांत्रिक मूल्यों और युवा सहभागिता पर भारत का रुख: दुनिया के लिए एक मिसाल

भारत ने हमेशा से वैश्विक मंचों पर यह साबित किया है कि उसका लोकतंत्र किसी पश्चिमी प्रमाण पत्र का मोहताज नहीं है। देश के करोड़ों युवा आज तकनीक, स्टार्टअप, विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान और नीति निर्माण में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने और जवाब मांगने की परंपरा संसद से लेकर सड़क तक पूरी तरह सुरक्षित और जीवंत है। देश की युवा शक्ति आज केवल विरोध करने के बजाय रचनात्मक रूप से देश के विकास में अपना योगदान दे रही है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों को यह याद दिलाया है कि उन्हें किसी भी देश की आंतरिक स्थिति का आकलन करते समय वहां की विविधता, संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं को सर्वोपरि रखना चाहिए, न कि चुनिंदा आख्यानों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए।

वैश्विक राजनीति में कूटनीतिक बहस तेज, भारत की दो टूक नीति से बदला समीकरण

संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट पर भारत के कड़े ऐतराज के बाद अब ग्लोबल लेवल पर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर देशों की आंतरिक नीतियों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह मजबूत रुख ग्लोबल साउथ (Global South) के उन देशों के लिए भी एक आवाज बन गया है जो पश्चिमी देशों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा थोपे गए नियमों से असहज महसूस करते हैं। भारत ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि देश के युवाओं और शासन के बीच का रिश्ता और संवाद पूरी तरह से संवैधानिक दायरे में तय होता है, और इसमें किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।