संयुक्त राष्ट्र में एस. जयशंकर की दहाड़ और चीन को खरी-खरी: जानिए क्या है जयशंकर डॉक्ट्रिन

संयुक्त राष्ट्र में एस. जयशंकर की दहाड़ और चीन को खरी-खरी: जानिए क्या है जयशंकर डॉक्ट्रिन

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर आज यदि किसी एक देश के आत्मविश्वास और मुखर तेवरों की सबसे ज्यादा चर्चा है, तो वह भारत है। संयुक्त राष्ट्र जैसे दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित वैश्विक मंचों पर जब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आंख में आंख डालकर देश के हितों की बात रखी, तो पूरी दुनिया के रणनीतिकार हैरान रह गए। चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीतियों और पश्चिमी देशों के दोहरे मानदंडों को उन्हीं की भाषा में करारा जवाब देने की इस अनूठी शैली को आज वैश्विक राजनीति में 'जयशंकर डॉक्ट्रिन' के नाम से जाना जाने लगा है। पारंपरिक कूटनीति की दबी-कुचली भाषा को छोड़कर आज का भारत अपनी शर्तों, अपने राष्ट्रीय हितों और आत्मनिर्भरता के बल पर दुनिया को राह दिखा रहा है। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि आखिर यह 'जयशंकर डॉक्ट्रिन' क्या है, इसने कैसे वैश्विक समीकरणों को बदला है और किस प्रकार भारत आज की तारीख में किसी के दबाव में आए बिना अपनी मजबूत चालें चल रहा है।

पारंपरिक कूटनीति से इतर बेबाक अंदाज और 'जयशंकर डॉक्ट्रिन' की मूल अवधारणा

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भारतीय विदेश नीति की एक अपनी सीमाएं और रक्षात्मक रुख हुआ करता था, जहां हर मुद्दे पर बेहद संतुलित और नपी-तुली प्रतिक्रिया दी जाती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश के नेतृत्व और विशेष तौर पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर के कार्यकाल में इस पारंपरिक दृष्टिकोण में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है। 'जयशंकर डॉक्ट्रिन' का मूल मंत्र स्पष्ट है—राष्ट्रीय हित सर्वोपरि, दोहरे मानदंडों का खुलकर विरोध और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर अडिग रहना। जब यूरोपीय देशों या पश्चिमी महाशक्तियों ने भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर दबाव बनाने की कोशिश की, तो जयशंकर ने दो टूक शब्दों में यह कह दिया कि यूरोप की समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं हो सकती हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हो सकतीं। इस प्रकार के बेबाक और तार्किक जवाबों ने पूरी दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब भारत वैश्विक दबावों के आगे घुटने टेकने वाला देश नहीं है, बल्कि वह अपनी कूटनीतिक चालें खुद तय करने की क्षमता रखता है।

संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक मंचों पर चीन को उसी की भाषा में करारा जवाब

एशियाई महाद्वीप और वैश्विक व्यापार में अपनी धमक बनाने की कोशिश कर रहे चीन के लिए भारत का यह बदला हुआ आक्रामक तेवर सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है। सीमा विवाद से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के प्रायोजकों को बचाने की बीजिंग की हरकतों को भारत ने हमेशा पुरजोर तरीके से बेनकाब किया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा और अन्य बहुपक्षीय बैठकों में जब भी चीन या उसके परोक्ष सहयोगियों ने भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास किया, भारतीय कूटनीति ने तुरंत और बेहद आक्रामक तरीके से पलटवार किया। जयशंकर ने दुनिया को यह समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि आतंकवाद और संप्रभुता के मामलों पर कोई दोहरा मापदंड नहीं चल सकता। चीन की विस्तारवादी नीतियों को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड (QUAD) और अन्य रणनीतिक गठबंधनों के जरिए जिस तरह से चेक किया जा रहा है, वह इसी 'जयशंकर डॉक्ट्रिन' का एक बहुत बड़ा और व्यावहारिक हिस्सा है।

आत्मनिर्भर भारत और आर्थिक कूटनीति का नया व शक्तिशाली आयाम

विदेश नीति केवल बयानों और मंचों पर भाषण देने तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके पीछे देश की आर्थिक और सामरिक ताकत का होना सबसे ज्यादा जरूरी है। आज का भारत केवल कूटनीति के स्तर पर ही नहीं, बल्कि रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष विज्ञान, डिजिटल क्रांति और आर्थिक विकास के मोर्चे पर भी आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रहा है। जब दुनिया के बड़े-बड़े देश सप्लाई चेन के बाधित होने और मंदी के दौर से जूझ रहे थे, तब भारत ने दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का गौरव हासिल किया और आज हम तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। 'मेक इन इंडिया' और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी हथियारों के निर्माण ने दुनिया के उन देशों को भी भारत का लोहा मानने पर मजबूर कर दिया है जो कभी हथियारों के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर हुआ करते थे। यह आर्थिक और सामरिक आत्मनिर्भरता ही विदेश मंत्री को वैश्विक मंचों पर इतनी मुखरता और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखने की असली ताकत प्रदान करती है।

ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज बनकर उभर रहा है नया और प्रभावी भारत

आज की वैश्विक व्यवस्था में एक बहुत बड़ा शून्य पैदा हो चुका है, जहां विकासशील देश और तथाकथित 'ग्लोबल साउथ' के देश पश्चिमी महाशक्तियों और चीन के बीच पिस रहे थे। ऐसे में भारत ने आगे बढ़कर इन छोटे और विकासशील देशों की सबसे मजबूत और भरोसेमंद आवाज बनने का ऐतिहासिक दायित्व निभाया है। चाहे वह कोरोना महामारी के दौरान वैक्सीन मैत्री के तहत दुनिया भर में दवाइयां और टीके पहुंचाना हो, या फिर अफ्रीकी संघ को जी-20 (G-20) का स्थायी सदस्य बनाकर ग्लोबल साउथ के हितों को सबसे बड़ी वैश्विक टेबल पर जगह दिलाना हो, भारत ने हर कदम पर वसुधैव कुटुंबकम की भावना को चरितार्थ किया है। दुनिया के देश अब यह भली-भांति समझ चुके हैं कि भारत किसी एक गुट का पिछलग्गू बनकर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और जिम्मेदार महाशक्ति के रूप में पूरी मानवता के कल्याण के लिए काम कर रहा है।

भविष्य की वैश्विक व्यवस्था और भारत की इस कूटनीतिक सफलता का दूरगामी प्रभाव

आने वाले दशकों में जब भी बीसवीं सदी की तीसरी और इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशकों की वैश्विक राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, तो भारत की इस स्वतंत्र और आक्रामक विदेश नीति के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया जाएगा। 'जयशंकर डॉक्ट्रिन' ने देश के हर नागरिक के मन में यह विश्वास पैदा कर दिया है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि हैं और दुनिया की कोई भी ताकत हमें अपने फैसलों को स्वतंत्र रूप से लेने से नहीं रोक सकती। संयुक्त राष्ट्र से लेकर दुनिया के हर कोने तक गूंजती भारत की इस नई दहाड़ ने यह साबित कर दिया है कि यह नया भारत है—जो घर में घुसकर भी वार करना जानता है और वैश्विक मंचों पर अपनी शर्तों पर दुनिया को दिशा दिखाना भी जानता है। जैसे-जैसे देश आर्थिक और सामरिक रूप से और अधिक शक्तिशाली होता जाएगा, यह डॉक्ट्रिन वैश्विक शांति और संतुलन का सबसे बड़ा आधार बनकर उभरेगी।