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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : दिल्ली- एनसीआर में वायु प्रदूषण को लेकर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) सक्रिय हो गया है । सीएक्यूएम ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ( एनसीआर) में स्थित 16 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश दिया है । अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि विस्तृत निरीक्षण के दौरान इन इकाइयों में पर्यावरण नियमों का गंभीर और लगातार उल्लंघन पाया गया । अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई वायु प्रदूषण को रोकने और कानूनी निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के अभियान के तहत की गई है । इन 16 कारखानों में से 14 हरियाणा के सोनीपत जिले में स्थित हैं, जबकि एक- एक कारखाना उत्तर प्रदेश और राजस्थान में है ।

ठंड के साथ वायु प्रदूषण ने दिल्ली को प्रभावित किया

सीआरईए के विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली और एनसीआर के शहरों में वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या है । पीएम2.5 और पीएम10 का स्तर निर्धारित मानकों से काफी अधिक है। देश के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में से आठ एनसीआर में स्थित हैं , जिनमें दिल्ली में पीएम10 का स्तर सबसे अधिक है । यह प्रदूषण मौसमी नहीं है, बल्कि पूरे वर्ष बना रहता है।

ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र ( सीआरईए) के एक नए विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली और एनसीआर के अन्य शहरों में प्रदूषण की स्थिति गंभीर है । इन शहरों में पीएम2.5 और पीएम10 दोनों का स्तर सामान्य से काफी अधिक है। वर्ष 2025 के पीएम2.5 आकलन के अनुसार, दिल्ली देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर है और गाजियाबाद तीसरा सबसे प्रदूषित शहर है। दस सबसे प्रदूषित शहरों में से आठ एनसीआर में स्थित हैं। वहीं, पीएम10 का स्तर दिल्ली, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा में सबसे अधिक है ।

पीएम 2.5 के स्तर के संदर्भ में , बर्नहाट (असम), दिल्ली और गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) देश के तीन सबसे प्रदूषित शहर हैं, जहां वार्षिक स्तर क्रमशः 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर, 96 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 93 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है ।

दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में नोएडा , गुरुग्राम , ग्रेटर नोएडा , भिवाड़ी , हाजीपुर , मुजफ्फरनगर और हापुड़ शामिल हैं । पीएम10 के स्तर में दिल्ली पहले स्थान पर है , जहां वार्षिक औसत 197 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है, जो राष्ट्रीय मानक से तीन गुना अधिक है । गाजियाबाद (190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) और ग्रेटर नोएडा (188 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं।

एनसीएपी केवल चार प्रतिशत शहरों को कवर करता है ।

देश के प्रदूषित शहरों में से केवल चार प्रतिशत ही राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम ( एनसीएपी) में शामिल हैं । वहीं, देश के 44 प्रतिशत शहर लगातार पांच वर्षों से अधिक समय से पीएम2.5 मानकों का पालन करने में विफल रहे हैं ।

इससे पता चलता है कि इन शहरों में प्रदूषण की समस्या केवल मौसमी नहीं है , बल्कि पूरे वर्ष बनी रहती है। यह समस्या परिवहन, उद्योग और बिजली संयंत्रों जैसे क्षेत्रों से निरंतर होने वाले उत्सर्जन के कारण उत्पन्न होती है ।

इस कार्यक्रम की शुरुआत से लेकर अब तक एनसीएपी और 15वें वित्त आयोग के तहत ₹ 13,415 करोड़ जारी किए जा चुके हैं । इसमें से ₹ 9,929 करोड़ (74 प्रतिशत) खर्च किए जा चुके हैं।

कुल व्यय का 68 प्रतिशत सड़क धूल प्रबंधन पर , 14 प्रतिशत परिवहन पर, 12 प्रतिशत अपशिष्ट और जैव द्रव्यमान जलाने की रोकथाम पर और तीन प्रतिशत निगरानी पर खर्च किया गया । उद्योग, घरेलू ईंधन उपयोग और जनसंपर्क पर एक प्रतिशत से भी कम खर्च किया गया ।

सीआरईए के विश्लेषक मनोज कुमार का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण को प्रभावी बनाने के लिए पीएम2.5 और इसके पूर्ववर्ती गैसों ( SO₂ और NO₂ ) को पीएम10 पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए ।

एनसीएपी के तहत गैर - अनुपालन करने वाले शहरों की सूची को संशोधित करना , उद्योगों और बिजली संयंत्रों के लिए सख्त उत्सर्जन मानक निर्धारित करना , स्रोत आवंटन अध्ययनों के आधार पर धन आवंटित करना और क्षेत्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण से निपटने के लिए वायुक्षेत्र -आधारित दृष्टिकोण अपनाना महत्वपूर्ण होगा ।