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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : प्रकृति के अनमोल खजाने और देश के प्रहरी माने जाने वाले हिमालयी क्षेत्रों से एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है। हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक शोध ने दुनिया भर के पर्यावरणविदों की नींद उड़ा दी है। शोध के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का सबसे घातक असर अब क्रायोस्फीयर यानी पृथ्वी के उन हिस्सों पर पड़ रहा है जहां बर्फ का साम्राज्य है। खासकर पूर्वी हिमालय के इलाकों में तापमान की वृद्धि दर उम्मीद से कहीं ज्यादा तेज दर्ज की गई है, जो आने वाले समय में बड़े संकट का संकेत दे रही है।

तेजी से गायब हो रही है बर्फ की सफेद चादर

वैज्ञानिकों के शोध में यह स्पष्ट हुआ है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से क्रायोस्फेरिक बदलावों (Cryospheric Changes) की गति में अप्रत्याशित तेजी आई है। इसका सीधा मतलब यह है कि ग्लेशियरों का पिघलना, बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव और स्थायी रूप से जमी हुई बर्फ (Permafrost) के पिघलने की प्रक्रिया अब नियंत्रण से बाहर होती दिख रही है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इन बदलावों पर जल्द लगाम नहीं लगाई गई, तो हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह चरमरा सकता है, जिससे निचले इलाकों में बाढ़ और जल संकट जैसी आपदाएं आम हो जाएंगी।

पूर्वी हिमालय पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा खतरा

रिपोर्ट में सबसे डराने वाली बात पूर्वी हिमालय को लेकर कही गई है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि हिमालय के अन्य हिस्सों की तुलना में पूर्वी हिमालय के कुछ पॉकेट्स में तापमान में वृद्धि बहुत अधिक तीव्र है। यहां गर्मी का ग्राफ तेजी से ऊपर भाग रहा है, जो न केवल यहां के ग्लेशियरों के लिए खतरा है, बल्कि यहां की दुर्लभ जैव विविधता को भी नष्ट कर रहा है। स्थानीय मौसम चक्र में आ रहे इन बदलावों के कारण मानसून और जल स्रोतों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है।

क्रायोस्फेरिक बदलावों का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध इंसानी अस्तित्व से है। क्रायोस्फीयर में हो रहे इन तीव्र बदलावों से समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और नदियों के प्रवाह में असंतुलन पैदा हो रहा है। पूर्वी हिमालय से निकलने वाली नदियों पर निर्भर करोड़ों लोगों की खेती, बिजली उत्पादन और आजीविका अब खतरे की जद में है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हिमालय के इस संवेदनशील हिस्से की रक्षा के लिए अब वैश्विक स्तर पर ठोस और तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।