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Prabhat Vaibhav, Digital Desk : देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने एक वकील के खिलाफ शुरू की गई अवमानना (Contempt) की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि न्यायाधीशों के खिलाफ बिना किसी ठोस सबूत के लगाए गए निराधार आरोप लोकतांत्रिक ढांचे और न्यायिक स्वतंत्रता की नींव को कमजोर करते हैं।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि 'निष्पक्ष आलोचना' और 'व्यक्तिगत हमले' के बीच एक लक्ष्मण रेखा होती है, जिसे पार करना भारी पड़ सकता है।

मामला: जज पर राजनीतिक झुकाव का आरोप

यह पूरा मामला एक वकील से जुड़ा है जिसने बॉम्बे हाई कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश पर गंभीर व्यक्तिगत आरोप लगाए थे। वकील का दावा था कि न्यायाधीश का झुकाव एक विशेष राजनीतिक दल की ओर है। वकील ने इन आरोपों को केवल अदालत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसके लिए बकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें

1. आलोचना और आरोप में अंतर (Criticism vs Allegations)

पीठ ने कहा कि लोकतंत्र में न्यायिक निर्णयों की निष्पक्ष, तर्कसंगत और नेक इरादे से आलोचना करना एक वैध अधिकार है। कोई भी याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय के फैसलों की सत्यता को चुनौती दे सकता है। लेकिन, जब यह आलोचना न्यायाधीश की सत्यनिष्ठा (Integrity) पर व्यक्तिगत हमले में बदल जाती है, तो इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

2. 'प्रेस कॉन्फ्रेंस' पर नाराजगी

अदालत ने वकील द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के कृत्य को 'गंभीर' माना। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक रूप से न्यायाधीश पर व्यक्तिगत आरोप लगाकर अपनी शिकायत को सार्वजनिक करना न्यायपालिका में जनता के विश्वास को कम करता है। इसे 'हल्के में' नहीं लिया जा सकता।

3. ठोस सबूत अनिवार्य

जस्टिस नाथ ने अपने आदेश में कहा, “जवाबदेही और जांच संवैधानिक लोकतंत्र के अंग हैं, लेकिन किसी न्यायाधीश के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप तभी लगाए जाने चाहिए जब उनके पीछे ठोस सबूत हों। बिना प्रमाण के की गई बयानबाजी न्यायिक स्वतंत्रता के लिए जोखिम पैदा करती है।”