Prabhat Vaibhav,Digital Desk : हिमालयी क्षेत्रों में इस बार मौसम की बेरुखी ने हालात गंभीर बना दिए हैं। बारिश और बर्फबारी की कमी से जहां पहाड़ सूखे जैसे संकट की ओर बढ़ रहा है, वहीं सर्दियों में ही धधकते जंगलों ने पर्यावरणीय चिंता और बढ़ा दी है। जंगलों से उठते धुएं और धुंध में घुला ब्लैक कार्बन अब पहाड़ की आबोहवा पर भारी पड़ने लगा है।
धुएं ने छीनी बर्फबारी की उम्मीद
विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों की आग से निकलने वाला धुआं और उसमें मौजूद ब्लैक कार्बन व अन्य हानिकारक गैसें वायुमंडलीय नमी को सोख ले रही हैं। इसका सीधा असर पश्चिमी विक्षोभ पर पड़ रहा है, जिससे बारिश और बर्फबारी की संभावना कमजोर हो गई है। नतीजा यह है कि पूरा पहाड़ी इलाका इस सीजन में वर्षा को तरस गया है और हिमालय की चोटियां भी धुंध में ओझल होती जा रही हैं।
8 से 10 गुना तक बढ़ा ब्लैक कार्बन
जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान अल्मोड़ा के पूर्व वैज्ञानिक प्रो. जेसी कुनियाल के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में पर्वतीय क्षेत्रों में ब्लैक कार्बन का स्तर 200 से 250 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रहता है। लेकिन पिछले तीन महीनों से बारिश न होने और लगातार वनाग्नि के कारण यह स्तर बढ़कर 1500 से 2000 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंच गया है, जो करीब दस गुना अधिक है।
उन्होंने बताया कि स्थानीय वनाग्नि के साथ-साथ सहारा मरुस्थल और इंडो-गंगा मैदान से आने वाला प्रदूषण भी हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंच रहा है, जिसकी पुष्टि वैज्ञानिक शोधों में हो चुकी है।
खेती और पर्यटन पर भी पड़ा असर
सूखे हालातों का असर खेती पर भी साफ दिखाई दे रहा है। रबी की करीब 10 से 15 प्रतिशत फसल सूखे की चपेट में आ चुकी है। वहीं, शरद और शीतकाल में पर्यटकों के लिए आकर्षण रहने वाला हिमदर्शन इस बार धुएं और प्रदूषण की वजह से मुश्किल हो गया है, जिससे पर्यटन गतिविधियां भी प्रभावित हुई हैं।
कुमाऊं में सर्दी में ही जले जंगल
इस बार जंगलों में आग की शुरुआत नवंबर 2025 में बागेश्वर जिले के दफौट क्षेत्र से हुई थी। इसके बाद अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल और चंपावत जिलों में आग की घटनाएं लगातार सामने आईं। अल्मोड़ा जिले में बिनसर अभयारण्य से सटे कई वन क्षेत्र आग की चपेट में आ चुके हैं।
पिथौरागढ़ में पंचाचूली की तलहटी और नैनीताल में कैंची, रातीघाट व सिल्टोना जैसे क्षेत्रों में भी आग लग चुकी है। चारों जिलों में अब तक करीब 62 घटनाओं में लगभग 260 हेक्टेयर जंगल जल चुका है।
सर्दी में 25 प्रतिशत जंगल जलने का दावा
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. रमेश सिंह बिष्ट के अनुसार, कुमाऊं के पर्वतीय डिवीजनों में इस बार सर्दी के मौसम में ही 20 से 25 प्रतिशत जंगल आग की चपेट में आ चुके हैं, जो बेहद चिंताजनक संकेत है।
पहाड़ों में AQI 150 के पार
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक, अल्मोड़ा में एयर क्वालिटी इंडेक्स 157 और रानीखेत में 156 तक पहुंच चुका है। नैनीताल में भी AQI 100 के आसपास बना हुआ है, जबकि अच्छी हवा का मानक 50 से नीचे माना जाता है। यह स्थिति बताती है कि पहाड़ों की पर्यावरणीय सेहत तेजी से बिगड़ रही है।
वन विभाग अलर्ट, लोगों से सहयोग की अपील
वन विभाग की ओर से कंट्रोल बर्निंग और निगरानी बढ़ा दी गई है। अल्मोड़ा के डीएफओ दीपक सिंह ने आम जनता से अपील की है कि वे उत्तराखंड फायर एप डाउनलोड कर आग की घटनाओं की तुरंत सूचना दें, ताकि समय रहते आग पर काबू पाया जा सके।



_915167333_100x75.jpg)
