Prabhat Vaibhav,Digital Desk : मध्य पूर्व के युद्धक्षेत्र में अब केवल मिसाइलें ही नहीं, बल्कि 'डाटा केबल' भी निशाने पर हैं। पिछले दिनों जब ईरान ने अपने ही देश का इंटरनेट 99% तक बंद कर दिया, तो दुनिया दंग रह गई। लेकिन अमर उजाला की विशेष पड़ताल में सामने आया है कि यह कोई तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक खौफनाक युद्ध रणनीति का हिस्सा था। ईरान ने खुद को तो 'डिजिटल किले' में कैद कर लिया है, पर वह पूरी दुनिया, खासकर भारत के इंटरनेट कनेक्शन को गहरे समुद्र के नीचे से काटने की ताकत रखता है।
ईरान का 'नेशनल इंफॉर्मेशन नेटवर्क': अपना इंटरनेट, अपना राज
ईरान ने साल 2010 से ही चीनी कंपनी हुआवेई (Huawei) की मदद से एक समानांतर इंटरनेट प्रणाली तैयार की है, जिसे नेशनल इंफॉर्मेशन नेटवर्क (NIN) कहा जाता है। लगभग 1 बिलियन डॉलर की लागत से बने इस नेटवर्क के कारण ईरान को वैश्विक इंटरनेट की जरूरत नहीं है। अगर दुनिया का इंटरनेट बंद भी हो जाए, तो ईरान के बैंक, सरकारी सेवाएं और सेना बिना किसी रुकावट के काम करते रहेंगे। यही कारण है कि युद्ध शुरू होते ही उसने बाहरी दुनिया से अपना नाता तोड़ लिया ताकि वह साइबर हमलों से बच सके।
समुद्र के नीचे बिछा 'मौत का जाल', निशाने पर लाल सागर
दुनिया के इंटरनेट ट्रैफिक का एक बड़ा हिस्सा लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे बिछी केबलों से होकर गुजरता है। लाल सागर में 17 ऐसी केबल हैं जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ती हैं। ईरान अपनी नौसैनिक माइन्स (खदानों), जहाजों के लंगर या अंडरवॉटर ड्रोन के जरिए इन केबलों को आसानी से क्षतिग्रस्त कर सकता है। अगर ये केबल कटती हैं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर दिन अरबों डॉलर का नुकसान होगा, जबकि ईरान का अपना NIN नेटवर्क सुरक्षित रहेगा।
भारत के लिए क्यों है यह 'रेड अलर्ट'?
भारत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। हमारे देश का पश्चिम की ओर जाने वाला करीब एक-तिहाई इंटरनेट ट्रैफिक होर्मुज जलडमरूमध्य की केबलों पर निर्भर है। इनमें AAE-1, FALCON और TATA-TGN Gulf जैसी प्रमुख केबल शामिल हैं।
मरम्मत की चुनौती: अगर युद्ध क्षेत्र में केबल कटती है, तो कोई भी विशेष मरम्मत पोत (Repair Vessel) वहां जाने का जोखिम नहीं उठाएगा।
बैकअप की कमी: भारत के पास इन केबलों की तुरंत मरम्मत के लिए अपना कोई विशेष जहाज नहीं है।
आर्थिक चोट: बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे टेक हब पूरी तरह से ठप हो सकते हैं, जिससे आईटी सेक्टर को करोड़ों का घाटा होगा।
एआई (AI) के सपनों पर मंडराता खतरा
ईरान ने हाल ही में बहरीन और यूएई में स्थित अमेज़न (AWS) के डेटा सेंटर्स पर ड्रोन हमले कर यह साफ कर दिया है कि उसका निशाना अब फिजिकल केबल के साथ-साथ 'क्लाउड' इंफ्रास्ट्रक्चर भी है। सऊदी अरब और यूएई में बन रहे 2.2 ट्रिलियन डॉलर के एआई कॉम्प्लेक्स अब युद्ध की आग के बीच फंस गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को 2008 जैसे ब्लैकआउट से बचने के लिए तुरंत 'पूर्वी मार्ग' (सिंगापुर और प्रशांत महासागर के रास्ते) पर अपना बैकअप बढ़ाना होगा।




