बोलचाल बंद थी, रूठे नीतीश को मनाने के लिए लालू ने दशहरा के दिन किया फोन
बिहार की राजनीति में 'बड़े भाई' लालू प्रसाद यादव और 'छोटे भाई' नीतीश कुमार का रिश्ता हमेशा से ही किसी राजनीतिक थ्रिलर फिल्म की तरह उतार-चढ़ाव भरा रहा है। दोनों नेताओं के बीच दोस्ती और दुश्मनी का यह दौर दशकों से चला आ रहा है, लेकिन वर्ष 2016 के दौरान बिहार की सत्ता के गलियारों में एक ऐसा दौर भी आया था जब दोनों शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत पूरी तरह से बंद हो गई थी। तत्कालीन महागठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इतने ज्यादा नाराज हो गए थे कि उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से दूरी बना ली थी और उनका फोन तक उठाना बंद कर दिया था। लालू यादव को जब लगा कि छोटे भाई का यह गुस्सा उनकी सरकार और बेटे तेजस्वी यादव के राजनीतिक भविष्य के लिए खतरा बन सकता है, तो उन्होंने विजयादशमी यानी दशहरा के पावन अवसर को एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। आइए एक पॉलिटिकल रिपोर्टर की नजर से गहराई से जानते हैं कि उस वक्त ऐसा क्या हुआ था जिसके चलते दोनों के बीच बातचीत बंद हो गई थी और कैसे दशहरा के दिन फोन बजते ही सियासत में भूचाल आ गया था।
शहाबुद्दीन के 'परिस्थितियों के मुख्यमंत्री' वाले बयान से भड़के थे नीतीश कुमार
इस पूरे विवाद और तनातनी की शुरुआत तब हुई थी जब सीवान के बाहुबली नेता और पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को अदालत से जमानत मिलने के बाद जेल से रिहा किया गया था। जेल से बाहर आते ही शहाबुद्दीन ने खुलेआम बयान देते हुए कहा था कि उनके असली नेता तो केवल लालू प्रसाद यादव हैं, जबकि नीतीश कुमार तो महज 'परिस्थितियों के मुख्यमंत्री' हैं। सुशासन बाबू के नाम से जाने जाने वाले नीतीश कुमार के लिए एक शासकीय प्रधान के रूप में यह बयान सीधा उनकी संवैधानिक अथॉरिटी और सम्मान पर बहुत बड़ा हमला था। नीतीश कुमार बेहद गुस्से में आ गए थे। इसके बाद जब शहाबुद्दीन को 30 सितंबर 2016 को दोबारा अदालत में आत्मसमर्पण करना पड़ा, तो उन्होंने फिर से नीतीश कुमार के खिलाफ तीखी टिप्पणी कर दी। राजद खेमे की ओर से शहाबुद्दीन को चुप न कराए जाने से आहत होकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लालू यादव से दूरी बना ली और दोनों के बीच रोजमर्रा की बोलचाल पूरी तरह से ठप हो गई।
जब तेजस्वी की डिप्टी सीएम की कुर्सी पर मंडराने लगा खतरा, तो लालू ने बनाया खास प्लान
10 साल के लंबे अंतराल के बाद लालू प्रसाद यादव के परिवार को बिहार की सत्ता में वापसी का मौका मिला था। उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव पहली बार विधायक बनने के साथ ही राज्य के उप-मुख्यमंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे थे, जबकि बड़े बेटे तेज प्रताप यादव भी कैबिनेट मंत्री थे। लेकिन नीतीश कुमार के इस तीखे तेवर और चुप्पी ने राजद कैंप में खलबली मचा दी थी। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर शुरू हो गई थी कि गुस्से से बौखलाए नीतीश कुमार कभी भी कोई बड़ा राजनीतिक फैसला ले सकते हैं और एनडीए (NDA) के साथ फिर से हाथ मिला सकते हैं। अपने बेटों का राजनीतिक करियर और सत्ता बचाने के लिए लालू यादव लगातार नीतीश कुमार से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नीतीश किसी भी कीमत पर बात करने के मूड में नजर नहीं आ रहे थे।
दशहरा के दिन बजा फोन: कैसे लालू यादव ने मनाया विजयादशमी का बहाना?
लालू यादव राजनीति के बहुत पुराने और मझे हुए खिलाड़ी माने जाते हैं। जब सीधे तौर पर बात करने के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे, तो उन्होंने धार्मिक और सामाजिक त्योहार का सहारा लिया। विजयादशमी (दशहरा) का दिन था। भारतीय परंपरा में यह माना जाता है कि दशहरे के दिन कोई भी शत्रुता या कड़वाहट भूलकर शुभकामनाएं दी जाती हैं। लालू यादव ने सही मौका भांपते हुए सीधे मुख्यमंत्री आवास फोन लगा दिया। विजयादशमी का पावन अवसर होने के कारण मर्यादावश नीतीश कुमार ने फोन उठाया और लालू यादव ने उन्हें विजयादशमी की बधाई देते हुए बातचीत का सिलसिला फिर से शुरू कर दिया। बातचीत के तुरंत बाद लालू यादव ने मीडिया के सामने आकर बड़े ही शांत अंदाज में बयान दिया कि उनके और नीतीश कुमार के बीच कोई भी मतभेद नहीं है। हालांकि, जब पत्रकारों ने पूछा कि सीएम आवास तो आपके घर के बिल्कुल करीब है, फिर आपने जाकर मिलकर बधाई क्यों नहीं दी, तो लालू यादव इस सवाल को टाल गए थे।
क्या मान गए थे 'नीतीश'? आठ महीने बाद बदल गई थी बिहार की पूरी सरकार!
ऊपरी तौर पर भले ही विजयादशमी के दिन हुई उस एक फोन कॉल ने उस वक्त के राजनीतिक संकट को कुछ समय के लिए टाल दिया हो और गठबंधन की सरकार चलती दिखाई दी, लेकिन हकीकत यह थी कि नीतीश कुमार उस अपमान को भूले नहीं थे। 'सुशासन बाबू' अपने आत्मसम्मान से समझौता करने वाले नेताओं में से नहीं थे और वे केवल सही मौके का इंतजार कर रहे थे। आखिरकार लगभग आठ महीने बाद जब सीबीआई और अन्य मामलों में तेजस्वी यादव और लालू परिवार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, तो नीतीश कुमार ने बिना देर किए जुलाई 2017 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राजद के साथ नाता तोड़कर दोबारा बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली। इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि दशहरा के दिन लालू यादव का फोन काम तो आया, लेकिन वह नीतीश कुमार के मन में जमे अविश्वास के बर्फ को पिघलाने में पूरी तरह से नाकाम रहा था।