Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ई-बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (ई-बीआरटीएस) के तहत इलेक्ट्रिक सार्वजनिक बसों के लिए आरक्षित फोरलेन बनाने की योजना बनाई जा रही है। सरकार का दावा है कि इससे ई-सार्वजनिक परिवहन मजबूत होगा, ट्रैफिक का दबाव घटेगा और प्रदूषण कम होगा, लेकिन देश के कई बड़े शहरों के अनुभव बताते हैं कि बीआरटीएस जितना आकर्षक लगता है, उतना ही जोखिम भरा भी साबित हुआ है।
अन्य शहरों का अनुभव
दिल्ली, इंदौर, भोपाल और जोधपुर जैसे शहरों में यह मॉडल भविष्य का समाधान बताकर शुरू किया गया, लेकिन कुछ वर्षों में यह ट्रैफिक जाम, जनविरोध और शहरी अव्यवस्था का कारण बन गया। उदाहरण के लिए:
दिल्ली: 2008 में अंबेडकर नगर-मूलचंद कारीडोर शुरू, निजी वाहनों और दोपहिया वाहनों के लिए जगह कम होने से 2016 में पूरी तरह हटाया गया।
इंदौर: 2013 में 11.5 किमी कारीडोर, बढ़ती ट्रैफिक संख्या के कारण कई हिस्सों में हटाना पड़ा।
भोपाल: 24 किमी लंबा बीआरटीएस 2009 में शुरू, 2019 में सड़क क्षमता घटने और जनविरोध के कारण समाप्त।
जोधपुर: 2014 में लागू, संकरी सड़कों के कारण असफल।
देहरादून की संवेदनशील स्थिति
देहरादून में लगभग 94% पंजीकृत वाहन निजी हैं, जबकि ई-बसों और सार्वजनिक ई-वाहनों की संख्या बहुत कम है। आईएसबीटी, राजपुर रोड और सहारनपुर रोड पहले से हाई-कंजेशन जोन हैं। ऐसे में केवल सार्वजनिक ई-बसों के लिए लेन आरक्षित करने से सामान्य यातायात पर असर पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले इसका व्यापक प्रभाव अध्ययन करना बेहद जरूरी है।
यूकेएमआरसी के अधूरे अनुभव
उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन (यूकेएमआरसी) ने पहले भी मेट्रो, मेट्रोलाइट और वैकल्पिक मोबिलिटी मॉडल जैसे प्रोजेक्ट पेश किए, लेकिन अधिकांश कागजों तक सीमित रह गए। हरिद्वार में रैपिड ट्रांजिट सिस्टम में निवेशकों ने रुचि नहीं दिखाई। ऐसे अनुभवों से यह स्पष्ट है कि ई-बीआरटीएस को लागू करने से पहले पुरानी असफलताओं से सीख लेना जरूरी है।
देश के अन्य उदाहरण
पुणे: 2006 में लागू, बाद में पूरी तरह हटाया गया
जयपुर: 2011 में शुरू, 2016 में हटाया गया
अमृतसर: 2014 में लागू, बाद में प्रभावहीन किया गया
राजकोट: 2012 में शुरू, बाद में वापस लिया गया
सूरत: 2013 में शुरू, कई हिस्सों में हटाना पड़ा



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