Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव ने अभी से कमर कस ली है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनावी रणनीति का मुकाबला उसी के अंदाज में करने के लिए सपा प्रमुख ने एक बड़ा फैसला लिया है। अब पार्टी में टिकट का आधार केवल सिफारिश नहीं, बल्कि प्रोफेशनल सर्वे और जमीनी डेटा होगा। अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि होली के बाद प्रदेश की सभी सीटों पर बाहरी एजेंसियों के माध्यम से सर्वे शुरू कराया जाएगा।
सिफारिश नहीं, 'जिताऊ' प्रत्याशी ही होगा विकल्प
सपा सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश यादव ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और क्षेत्रीय क्षत्रपों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि टिकट वितरण में किसी भी प्रकार की सिफारिश स्वीकार नहीं की जाएगी। प्रत्याशी चयन का एकमात्र पैमाना 'जिताऊ' (Winability) होना होगा। इसके लिए पार्टी कई बाहरी एजेंसियों की मदद ले रही है, जो हर विधानसभा क्षेत्र की बारीकी से जांच करेंगी।
इन 5 पैमानों पर परखी जाएगी दावेदारी
होली के बाद शुरू होने वाले सर्वे में संभावित उम्मीदवारों को निम्नलिखित मानकों पर खरा उतरना होगा:
स्थानीय लोकप्रियता: जनता के बीच प्रत्याशी की छवि और उसकी स्वीकार्यता क्या है?
जातीय समीकरण: क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने में प्रत्याशी कितना फिट बैठता है?
संगठन पर पकड़: क्या प्रत्याशी बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं को एकजुट रख सकता है?
सोशल मीडिया और डिजिटल उपस्थिति: जनता से संवाद के लिए तकनीक का कितना उपयोग हो रहा है?
बूथ प्रबंधन और संसाधन: चुनाव के दौरान बूथ स्तर पर प्रबंधन की क्षमता क्या है?
2022 की हार से लिया सबक
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा का प्रदर्शन काफी बेहतर हुआ था, लेकिन कई सीटों पर बहुत मामूली अंतर से हार मिली थी। पार्टी का मानना है कि उन सीटों पर टिकट वितरण में हुई चूक या गलत चेहरे के चयन ने सत्ता की राह रोक दी थी। इस बार, 2022 में दूसरे नंबर पर रहे प्रत्याशियों का 'रिपोर्ट कार्ड' तैयार किया जा रहा है। जिन सीटों पर हार का अंतर कम था, वहां विशेष फोकस रहेगा।
भाजपा की तर्ज पर 'डेटा आधारित' चयन
भाजपा की लगातार जीत के पीछे अक्सर उनके कड़े सर्वे और फीडबैक सिस्टम को बड़ी वजह माना जाता है। अब समाजवादी पार्टी भी उसी पेशेवर तरीके को अपना रही है। बाहरी एजेंसियां प्रत्येक विधानसभा में 3 से 4 संभावित नामों का पैनल तैयार करेंगी, जिनका अंतिम मूल्यांकन खुद पार्टी हाईकमान करेगा। चुनाव से ठीक पहले इस प्रक्रिया को एक बार फिर दोहराया जाएगा ताकि प्रत्याशी की तत्कालीन स्थिति का पता चल सके।
चुनौतियां और क्षेत्रीय क्षत्रपों का दबाव
हालांकि, अखिलेश यादव के लिए इस फार्मूले को लागू करना इतना आसान भी नहीं होगा। कई सीटों पर पुराने दिग्गजों और क्षेत्रीय नेताओं का दबाव रहता है। इसके अलावा, अगर भविष्य में किसी अन्य दल से गठबंधन होता है, तो सीटों के बंटवारे में भी तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती होगी।




