पाकिस्तान के पहले PM लियाकत अली खान की हत्या का खौफनाक सच
16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी के कंपनी बाग में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान जैसे ही जनता को संबोधित करने के लिए मंच पर पहुंचे, तभी एक सिरफिरे बंदूकधारी ने उन पर गोलियां बरसाकर उनकी हत्या कर दी। इस राजनीतिक हत्याकांड ने न सिर्फ उस वक्त के नए देश पाकिस्तान को हिलाकर रख दिया था, बल्कि आज भी यह एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है। इतिहास के पन्नों में यह सवाल बार-बार उठता है कि आखिर पाकिस्तान की नींव रखने वाले और 'कायद-ए-आज़म' जिन्ना के सबसे करीबी कहे जाने वाले लियाकत अली खान का कत्ल क्यों किया गया? क्या इसके पीछे उनकी पत्नी बेगम राना लियाकत अली खान का हिजाब न पहनना था या फिर कश्मीर युद्ध में भारत के साथ युद्धविराम जैसी नीतियां थीं? आइए एक स्वतंत्र ग्राउंड रिपोर्टर की नजर से इस 75 साल पुराने ऐतिहासिक और सनसनीखेज हत्याकांड के हर एक काले पन्ने को गहराई से टटोलते हैं।
अल्मोड़ा की हिंदू बेटी से निकाह और कट्टरपंथियों की आंखों में खटकती पश्चिमी जीवनशैली
लियाकत अली खान की हत्या के कारणों को समझने के लिए उनकी निजी जिंदगी और परिवार पर नजर डालना बेहद जरूरी है। उनकी पत्नी बेगम राना लियाकत अली खान का जन्म भारत के उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा में एक कुमाऊंनी हिंदू ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जिनका मूल नाम शीला आइरीन पंत (Irene Pant) था। शादी के बाद उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया था, लेकिन उनके विचार, पहनावा और कार्यशैली बेहद आधुनिक व प्रगतिशील थे।
तत्कालीन पाकिस्तानी कट्टरपंथी मुल्लाओं, मौलानाओं और रूढ़िवादी इस्लामिक संगठनों को यह बात जरा भी रास नहीं आती थी कि देश के वजीर-ए-आजम की बेगम बिना बुर्के और बिना हिजाब के सार्वजनिक आयोजनों में शिरकत करती थीं। राना लियाकत अली ने 'ऑल पाकिस्तान वूमेन्स एसोसिएशन' (APWA) की स्थापना की और महिलाओं को आधुनिक शिक्षा, सामाजिक अधिकारों तथा आत्मनिर्भरता की वकालत की। कट्टरपंथियों का मानना था कि लियाकत अली खान अपनी पत्नी के प्रभाव में आकर पाकिस्तान को एक धार्मिक राष्ट्र के बजाय पश्चिमी धर्मनिरपेक्ष ढांचे की तरफ ले जा रहे हैं, जो उनकी कट्टर सोच के बिल्कुल खिलाफ था।
कश्मीर में युद्धविराम और भारत से नरमी: क्या 'अधूरा जिहाद' बना कत्ल की सबसे बड़ी वजह?
इस सनसनीखेज मर्डर मिस्ट्री का दूसरा और सबसे बड़ा कूटनीतिक पहलू 1947-48 के पहले भारत-पाक युद्ध और कश्मीर मुद्दे से जुड़ा हुआ था। जब पाकिस्तान ने कबीलाइयों की आड़ में कश्मीर पर आक्रमण किया था, तो शुरुआती सफलताओं के बाद लियाकत अली खान ने अंतरराष्ट्रीय दबाव और सामरिक परिस्थितियों के चलते भारत के साथ युद्धविराम (Ceasefire) पर सहमति जता दी थी। पाकिस्तान के कट्टरपंथी गुटों, 'खाकसार आंदोलन' और सेना के भीतर मौजूद जिहादी मानसिकता वाले अधिकारियों को यह समझौता एक बहुत बड़ा धोखा लगा।
उन्हें लगा कि लियाकत अली खान ने कश्मीर को भारत से पूरी तरह छीनने का 'अधूरा जिहाद' बीच में ही छोड़ दिया है और वे भारत के प्रति नरम रुख अपना रहे हैं। हत्या से कुछ महीने पहले ही पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल अकबर खान ने लियाकत सरकार का तख्तापलट करने की एक बड़ी साजिश रची थी, जिसे 'रावलपिंडी षड्यंत्र' (Rawalpindi Conspiracy) के नाम से जाना जाता है। इस असफल तख्तापलट के पीछे भी मुख्य रूप से कश्मीर नीति को लेकर सेना की नाराजगी ही थी।
कौन था हत्यारा सैयद अकबर और उसे तुरंत गोली मारकर क्यों चुप कराया गया?
16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी में जब लियाकत अली खान भाषण देने के लिए उठे, तो भीड़ में मौजूद अफगान मूल के नागरिक 'सैयद अकबर' ने अपनी 9mm की पिस्टल निकाली और सीधे प्रधानमंत्री के सीने में दो गोलियां दाग दीं। लेकिन इस पूरे हत्याकांड का सबसे संदिग्ध और खौफनाक मोड़ तब आया जब वहां मौजूद पुलिस अधिकारी 'मोहम्मद शाह' ने हत्यारे सैयद अकबर को जिंदा पकड़कर पूछताछ करने और उसका सच उगलवाने के बजाय मौके पर ही अंधाधुंध गोलियां चलाकर मार डाला।
एकमात्र मुख्य गवाह और हत्यारे की इस तरह फौरन मौत ने इस बात को पुख्ता कर दिया कि इस खूनी साजिश के पीछे पाकिस्तान की राजनीति और सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ बहुत ताकतवर चेहरे शामिल थे, जो कभी नहीं चाहते थे कि कत्ल की असली वजह दुनिया के सामने आ सके। बाद में मामले की लीपापोती के लिए जस्टिस मुनीर आयोग का गठन तो किया गया, लेकिन उसकी जांच रिपोर्ट के दर्जनों अहम दस्तावेज और पन्ने हमेशा के लिए दबा दिए गए।
पाकिस्तान की राजनीति में सेना और कट्टरपंथ के वर्चस्व की खौफनाक शुरुआत
पाकिस्तान के इतिहास के शुरुआती वर्षों में ही हुए इस वीभत्स हत्याकांड ने देश में लोकतंत्र की जड़ों को पनपने से पहले ही कुचल दिया और यहीं से पाकिस्तानी राजनीति में सेना, खुफिया एजेंसी आईएसआई और कट्टरपंथी ताकतों के सीधे दखਲ का खौफनाक दौर शुरू हुआ। हिंदू मूल की पत्नी का हिजाब न पहनना, पश्चिम से बढ़ती नजदीकी और कश्मीर के मुद्दे पर लियाकत अली खान की व्यावहारिक तथा नरम नीतियां—इन तमाम बिंदुओं ने मिलकर उन्हें कट्टरपंथियों के निशाने पर ला खड़ा किया था। भले ही आज दशकों बाद भी इस हाई-प्रोफाइल मर्डर मिस्ट्री की फाइलें ठंडे बस्ते में बंद कर दी गई हों, लेकिन इतिहास और राजनीति के गलियारों में यह हत्याकांड आज भी पाकिस्तान के सबसे बड़े और गहरे राज के रूप में जिंदा है।