सऊदी अरब पहुंचे तुर्की और पाकिस्तान के आर्मी चीफ, रियाद में बुलाई गई आपात बैठक
मध्य पूर्व (Middle East) के भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बार फिर से भारी उबाल देखने को मिल रहा है, और इस बार कूटनीति के केंद्र में खाड़ी देश सऊदी अरब और यमन के विद्रोही संगठन हूती (Houthis) आ गए हैं। यमन की तरफ से सऊदी अरब के विभिन्न संवेदनशील ठिकानों और ऊर्जा बुनियादी ढांचे को लगातार निशाना बनाए जाने के बाद पश्चिम एशिया में सुरक्षा का संकट गहरा गया है। इसी गंभीर खतरे को देखते हुए और कुछ समय पहले अस्तित्व में आए ऐतिहासिक 'मक्का डिफेंस एग्रीमेंट' (Mecca Joint Defence Agreement) की प्रभावशीलता को परखने के लिए राजधानी रियाद में एक बहुत बड़ी आपातकालीन बैठक बुलाई गई है। इस हाई-प्रोफाइल बैठक में हिस्सा लेने के लिए तुर्की और पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारी और रक्षा मंत्री सीधे सऊदी अरब पहुंच चुके हैं। इस त्रिपक्षीय बैठक को इस रूप में देखा जा रहा है कि क्या अब नाटो (NATO) की तर्ज पर बने इस 'इस्लामिक डिफेंस पैक्ट' के तहत हूतियों के खिलाफ कोई बड़ा और कड़ा सैन्य कदम उठाया जाएगा या फिर कूटनीतिक रास्तों से इस तनाव को शांत किया जाएगा। इस घटनाक्रम ने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, क्योंकि यह नया सुरक्षा समझौता अपने पहले ही बड़े क्षेत्रीय इम्तिहान के दौर से गुजर रहा है।
मक्का डिफेंस पैक्ट पर मंडराया पहला बड़ा संकट, हूती हमलों से गरमाया माहौल
कुछ ही महीने पहले सऊदी अरब के मक्का शहर में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा एक बहुत बड़े और रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसे 'मक्का डिफेंस एग्रीमेंट' का नाम दिया गया था। इस समझौते के तहत यह प्रावधान किया गया था कि नाटो के अनुच्छेद-5 की तर्ज पर इन तीनों देशों में से यदि किसी पर भी कोई बाहरी सैन्य हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और वे संयुक्त रूप से इसका जवाब देंगे। हाल के दिनों में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब की ओर लगातार ड्रोन और मिसाइल हमले किए जाने के बाद इस समझौते की साख पर सवाल उठने लगे थे कि क्या जरूरत पड़ने पर यह गठबंधन वाकई सक्रिय होगा या नहीं। सऊदी अरब पर बढ़ते इन हमलों और यमन के मोर्चे पर सुलगती चिंगारी के बाद अब रियाद में बुलाई गई इस आपात बैठक में इस बात पर मंथन किया जा रहा है कि इस खतरे से सामूहिक रूप से कैसे निपटा जाए।
तुर्की और पाकिस्तान के रक्षा प्रमुखों का रियाद दौरा, रणनीतिक संस्थागतकरण पर हो रहा मंथन
तुर्की की ओर से देश के विदेश मंत्री हाकन फिदान, राष्ट्रीय रक्षा मंत्री यासर गुलर और सेना के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ जनरल सेलcuk बायरक्ताрог्लू इस महत्वपूर्ण बैठक में शामिल होने के लिए रियाद पहुंचे हैं, जबकि पाकिस्तान की तरफ से भी शीर्ष सैन्य नेतृत्व और कूटनीतिक प्रतिनिधिमंडल इस उच्च स्तरीय विचार-विमर्श का हिस्सा बना है। तुर्की के विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इस बैठक का मुख्य एजेंडा क्षेत्र में तेजी से बदल रहे सुरक्षा हालात की समीक्षा करना और इस रक्षा समझौते (Mecca Pact) को पूरी तरह से संस्थागत रूप (Institutionalization) देना है। चूंकि यह समझौता अभी अपने शुरुआती चरणों में है और इसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया चल रही है, इसलिए हूतियों के हमलों ने इसे तत्काल एक्टिवेट करने का दबाव बना दिया है। बैठक में इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि क्या सैन्य कार्रवाई (Kinetic Action) से पहले राजनीतिक और कूटनीतिक चैनलों के जरिए ईरान के माध्यम से हूतियों पर दबाव बनाया जाए, ताकि क्षेत्र में और अधिक बड़े युद्ध को टाला जा सके।
ईरान का राजनीतिक प्रस्ताव और कूटनीति के नए रास्ते पर भी हो रहा विचार
इस बीच, इस आपात बैठक से पहले कूटनीतिक गलियारों से यह खबर भी सामने आई है कि ईरान ने इस पूरे विवाद को सुलझाने के लिए एक राजनीतिक दृष्टिकोण का सुझाव दिया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने जानकारी दी है कि ईरान ने हूतियों और अन्य संबद्ध मिलिशिया समूहों से थोड़ी दूरी बनाते हुए इस तनाव को बातचीत के जरिए हल करने की इच्छा जताई है। रियाद में हो रही इस बैठक में इस बात पर भी माथापच्ची की जा रही है कि क्या सैन्य ताकत दिखाने के बजाय राजनीतिक और संवाद के रास्ते से हूती हमलों को रोका जा सकता है। हालांकि, सऊदी अरब की सुरक्षा और उसकी क्षेत्रीय अखंडता को लेकर तुर्की और पाकिस्तान पर दबाव लगातार बनता जा रहा है। दुनिया भर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि रियाद में हो रही इस त्रिपक्षीय बैठक के बाद क्या कोई संयुक्त सैन्य रणनीति सामने आती है या फिर कूटनीतिक समझौतों के जरिए ही इस संकट का कोई स्थायी समाधान निकाला जाता है।