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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उच्च रक्तचाप यानी हाइपरटेंशन को चिकित्सा जगत में 'साइलेंट किलर' कहा जाता है। यह एक ऐसी बीमारी है जो बिना किसी खास लक्षण के आपके दिल, दिमाग और गुर्दों को खोखला कर सकती है। अब तक बीपी के मरीजों के लिए रोज सुबह एक गोली खाना मजबूरी थी, लेकिन चिकित्सा विज्ञान अब एक ऐसी क्रांतिकारी दिशा में बढ़ रहा है जहाँ आपको रोजाना दवा लेने की जरूरत नहीं होगी। नए शोधों के अनुसार, भविष्य में साल में केवल दो इंजेक्शन लगवाकर आप अपने रक्तचाप को पूरी तरह नियंत्रित रख सकेंगे।

जिलेबासिरिन (Zilebesiran): बीपी के इलाज में नई उम्मीद

मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट' में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जिलेबासिरिन (Zilebesiran) नामक दवा इस समय चर्चा का केंद्र बनी हुई है। इसे दिग्गज फार्मा कंपनियां 'रोश' और 'एलनिलम' मिलकर तैयार कर रही हैं। यह दवा वर्तमान में क्लीनिकल ट्रायल के अंतिम चरण में है। इस इंजेक्शन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे साल में केवल दो बार लेने की आवश्यकता हो सकती है, जो मरीजों को रोज-रोज के दवा के झंझट से आजादी दिलाएगा।

कैसे काम करती है यह आधुनिक इंजेक्शन तकनीक?

इस इंजेक्शन में अत्याधुनिक RNA तकनीक का उपयोग किया गया है।

प्रोटीन पर प्रहार: यह इंजेक्शन लिवर में बनने वाले 'एंजियोटेन्सिनोजेन' नामक प्रोटीन को कम करता है।

रक्तचाप पर नियंत्रण: यह वही प्रोटीन है जो शरीर में रक्तचाप को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होता है।

लंबे समय तक असर: शोध के अनुसार, इस दवा का एक सिंगल इंजेक्शन लगभग छह महीने तक शरीर में सिस्टोलिक रक्तचाप को प्रभावी ढंग से कम रखने में सक्षम पाया गया है।

भूलने की बीमारी और 'पिल थकान' से मिलेगा छुटकारा

अक्सर देखा जाता है कि कई बीमारियों से जूझ रहे मरीज इतनी सारी दवाइयां लेते-लेते थक जाते हैं (Pill Fatigue), या कई बार बीपी की गोली लेना भूल जाते हैं। बीपी की दवा छोड़ने से अचानक स्ट्रोक या हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। साल में दो बार लगने वाला यह इंजेक्शन न केवल इस जोखिम को कम करेगा, बल्कि उन लोगों के लिए वरदान साबित होगा जो नियमित दवा नहीं खा पाते।

क्या हैं चुनौतियां और विशेषज्ञ की राय?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 140/90 mmHg से ऊपर का बीपी खतरनाक श्रेणी में आता है। भारत में भी करोड़ों लोग इसकी चपेट में हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि जिलेबासिरिन जैसी दवाएं अभी तीसरे चरण के परीक्षण (Phase 3 Trial) में हैं और इनके दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है। एक बड़ी चुनौती इसकी लागत (Cost) भी हो सकती है। भारत जैसे विकासशील देशों में यह आम आदमी की जेब के लिए कितनी किफायती होगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।