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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शनिवार को होने वाली अमेरिका-ईरान शांति वार्ता शुरू होने से पहले ही बड़े कूटनीतिक गतिरोध में फंस गई है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिका को दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि यदि उनकी दो मुख्य शर्तें तुरंत नहीं मानी गईं, तो वे मेज छोड़कर उठ जाएंगे और आगे कोई बातचीत नहीं होगी। इस कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मेजबान पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

ईरान की वे 2 शर्तें जिन पर फंसा है पेंच

ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़ेर ग़ालिबफ़ के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने अपनी मांगों का मसौदा स्पष्ट कर दिया है:

लेबनान और इज़राइल के बीच पूर्ण युद्धविराम: ईरान चाहता है कि अमेरिका इज़राइल पर दबाव बनाए ताकि लेबनान सीमा पर जारी सैन्य कार्रवाई तुरंत रोकी जाए।

जब्त संपत्तियों की तत्काल रिहाई: अमेरिका द्वारा फ्रीज की गई ईरान की अरबों डॉलर की संपत्तियों को बिना किसी देरी के जारी किया जाना चाहिए।

ईरान का कहना है कि इन ठोस कदमों के बिना किसी भी तरह की 'शांति चर्चा' केवल समय की बर्बादी है।

'अमेरिका पर भरोसा नहीं': ग़ालिबफ़ का तीखा हमला

इस्लामाबाद पहुंचते ही ग़ालिबफ़ ने अमेरिका की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ईरान के 'नेक इरादों' के बावजूद पिछली बार चर्चाओं के दौरान ही ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई। ग़ालिबफ़ ने कड़े शब्दों में कहा:

"हमें अब अमेरिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। अगर यह बातचीत फिर से दबाव बनाने या धोखे का कोई जरिया है, तो याद रहे कि ईरान कड़ा जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।"

इस्लामाबाद में हाई अलर्ट और अमेरिकी खेमे की हलचल

दूसरी ओर, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भी इस्लामाबाद में मौजूद है। उनके साथ जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ जैसे प्रमुख चेहरे हैं। अमेरिका इस वार्ता को मध्य पूर्व में स्थिरता के अवसर के रूप में देख रहा है, लेकिन ईरान की 'पहले शर्तें, फिर बात' वाली नीति ने अमेरिकी कूटनीतिज्ञों को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है।

क्या विफल हो जाएगी वार्ता?

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका इन शर्तों पर कोई लचीला रुख नहीं दिखाता, तो यह ऐतिहासिक वार्ता बिना किसी नतीजे के समाप्त हो सकती है। 1979 के बाद पहली बार आमने-सामने की इस उच्चतम स्तर की वार्ता के विफल होने का अर्थ होगा—मध्य पूर्व में संघर्ष का एक नया और अधिक खतरनाक दौर। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस्लामाबाद के उस बंद कमरे पर टिकी हैं जहां ये दोनों दुश्मन देश एक-दूसरे के सामने बैठने वाले हैं।