Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए बिसात बिछनी शुरू हो गई है। प्रदेश की करीब 21 प्रतिशत दलित आबादी, जिसका प्रभाव 403 में से लगभग 300 सीटों पर माना जाता है, फिलहाल सभी बड़े राजनीतिक दलों के एजेंडे में सबसे ऊपर है। 14 अप्रैल को डॉ. बी.आर. आंबेडकर की जयंती के अवसर पर भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच दलित मतदाताओं को साधने की होड़ दिखाई देगी।
भाजपा की 'आंबेडकर मूर्ति विकास योजना': प्रतीकों और विकास का संगम
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने दलितों के बीच अपनी पकड़ और गहरी करने के लिए 'डॉ. बी.आर. आंबेडकर मूर्ति विकास योजना' को मंजूरी दी है।
रणनीति: प्रदेश के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में 10-10 स्मारकों (डॉ. आंबेडकर, संत रविदास, ज्योतिबा फुले, महर्षि वाल्मीकि आदि) का सौंदर्यीकरण और विकास किया जाएगा।
लक्ष्य: इन स्थलों को जन उपयोगी केंद्रों के रूप में विकसित करना, ताकि 2027 तक भाजपा का 'नीला रंग' और गहरा हो सके।
आंबेडकर जयंती: 14 अप्रैल को सभी विधानसभाओं में सांसद और विधायक जनता को सरकार की इन योजनाओं की जानकारी देंगे।
सपा का PDA कार्ड: संविधान बचाने का नैरेटिव
2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता से उत्साहित समाजवादी पार्टी अपनी PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति को और धार दे रही है।
रणनीति: सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दलितों को संदेश देने के लिए पिछली बार 'नीला गमछा' धारण किया था। अब पार्टी गांव और सेक्टर स्तर पर संविधान की रक्षा को लेकर चर्चा आयोजित करेगी।
नैरेटिव: सपा का मुख्य जोर संविधान और आरक्षण पर 'खतरे' के नैरेटिव को जिंदा रखने पर है, जिसने उन्हें पिछले चुनावों में दलितों के बीच पैठ बनाने में मदद की थी।
[Graphic representation of political symbols (Lotus, Cycle, Elephant, Hand) converging towards a portrait of Dr. B.R. Ambedkar]
बसपा का अस्तित्व बचाने का संघर्ष
दलितों की पारंपरिक पार्टी मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए यह चुनाव साख बचाने की लड़ाई है। 2022 के विधानसभा चुनाव में महज एक सीट पर सिमटने के बाद, मायावती अब 2007 के 'सोशल इंजीनियरिंग' फॉर्मूले को फिर से आज़माना चाहती हैं।
शक्ति प्रदर्शन: 14 अप्रैल को लखनऊ के आंबेडकर स्मारक पर बसपा एक विशाल शक्ति प्रदर्शन की तैयारी में है, ताकि अपने कैडर वोट को छिटकने से रोका जा सके।
कांग्रेस का 'दलित संवाद'
कांग्रेस भी पीछे नहीं है और वह गांव-मोहल्ला स्तर पर 'दलित संवाद' के जरिए आरक्षण और संविधान बचाने के मुद्दे पर इस वर्ग से जुड़ने की कोशिश कर रही है।




