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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसी के मद्देनजर यूरोपीय देश ऑस्ट्रिया (Austria) एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। सरकार ने प्रस्ताव रखा है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाए। इस फैसले ने दुनिया भर में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा (Digital Safety) को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

क्यों जरूरी हुआ यह प्रतिबंध? लत और एल्गोरिदम पर वार

ऑस्ट्रिया सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ऐसे 'एडिक्टिव' एल्गोरिदम का इस्तेमाल करते हैं, जो बच्चों को घंटों स्क्रीन से चिपके रहने पर मजबूर कर देते हैं। यह लत न केवल बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित करती है, बल्कि उनके मानसिक विकास में भी बाधा डालती है। इसके अलावा, कम उम्र में बच्चे ऐसी संवेदनशील और अनुचित सामग्री (Inappropriate Content) के संपर्क में आ रहे हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

किसी खास ऐप पर नहीं, 'खतरनाक' फीचर्स पर होगी कार्रवाई

सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कानून किसी एक विशेष सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (जैसे इंस्टाग्राम, टिकटॉक या स्नैपचैट) के खिलाफ नहीं है। इसके बजाय, सरकार उन सभी प्लेटफॉर्म्स की जांच करेगी जो बच्चों को लुभाने के लिए व्यसनकारी फीचर्स का उपयोग करते हैं। जून के अंत तक इस कानून का मसौदा (Draft) तैयार होने की उम्मीद है, जिसके बाद ही इसे सख्ती से लागू किया जाएगा।

दुनिया भर में बढ़ रहा है 'सोशल मीडिया बैन' का चलन

बच्चों की सुरक्षा के लिए कड़े कानून बनाने की दौड़ में ऑस्ट्रिया अकेला नहीं है। कई अन्य विकसित देश भी इस दिशा में सख्त कदम उठा चुके हैं:

ऑस्ट्रेलिया: यहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पहले ही प्रतिबंध लागू है।

फ्रांस: फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इसी तरह के नियम बनाए हैं।

ब्रिटेन और अमेरिका: इन देशों में भी बच्चों के लिए 'सेफ टेक' (Safe Tech) कानूनों पर गहन चर्चा चल रही है।

डिजिटल स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा: छिड़ी बड़ी बहस

ऑस्ट्रिया के इस प्रस्ताव ने नागरिक समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है। जहां अभिभावकों और मनोवैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग इसे बच्चों के बचपन को बचाने के लिए जरूरी कदम मान रहा है, वहीं डिजिटल राइट्स एक्टिविस्ट्स का तर्क है कि यह बच्चों की डिजिटल स्वतंत्रता और सीखने के अधिकार पर प्रहार है। भारत में भी सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों में बढ़ते तनाव और नींद की कमी के मामले सामने आ रहे हैं, जिससे इस वैश्विक बहस की प्रासंगिकता और बढ़ गई है।