Prabhat Vaibhav,Digital Desk : करीब 28 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पंजाब की विधवा कश्मीर कौर को आखिरकार न्याय मिला। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 1998 में उनके मुआवजा दावे को खारिज करने वाले फैसले को रद्द कर दिया।
मामला और पृष्ठभूमि
अगस्त 1996 में जसबीर सिंह एक ट्रैक्टर दुर्घटना में मारे गए।
जसबीर उस समय अपने पिता सिमर चंद के स्वामित्व वाले ट्रैक्टर पर चालक के रूप में कार्यरत थे।
दुर्घटना के बाद उनकी पत्नी और नन्हा बच्चा आर्थिक संकट में आ गए।
हाईकोर्ट ने क्या निर्णय दिया
कोर्ट ने माना कि मुआवजा कश्मीर कौर का हक है।
ब्याज और जुर्माना जोड़कर कुल 4,27,140 रुपये मुआवजे के तौर पर देने का आदेश।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पिता-पुत्र का रिश्ता किसी वैध नियोक्ता-कर्मचारी संबंध को स्वत: समाप्त नहीं करता।
इंश्योरेंस कंपनी का विरोध
ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी ने दावा खारिज करने की कोशिश की और तर्क दिया कि पिता और पुत्र के बीच वास्तविक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं हो सकता।
मई 1998 में कर्मचारी मुआवजा आयुक्त ने भी प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के आधार पर दावा खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट का तर्क
जस्टिस पंकज जैन ने कहा कि ऐसे गवाह के कथन पर भरोसा करना गलत था जो मृतक और नियोक्ता के मामलों से परिचित नहीं था।
केवल रक्त संबंध के आधार पर रोजगार संबंध को नकारा नहीं जा सकता।
पिता अपने पुत्र को काम पर रख सकते हैं और इसके आधार पर मुआवजा दिया जा सकता है।
मुआवजे की गणना
अनुमानित मासिक वेतन 4,000 रुपये के 50 प्रतिशत के आधार पर मुआवजा तय।
दुर्घटना के 30 दिन बाद से 12% वार्षिक ब्याज देय होगा।
मुआवजा राशि पर 35% जुर्माना भी लगाया गया है, जिस पर 7% ब्याज देय होगा।
इस फैसले से विधवा और बच्चे को आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हुई और यह पारिवारिक रोजगार संबंधों पर कानून का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।




