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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : मध्य पूर्व में जारी भीषण युद्ध और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने पूरी दुनिया के कूटनीतिक गलियारों में भूकंप ला दिया है। अमेरिका के वॉशिंगटन से प्रकाशित इस सनसनीखेज रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान पर सैन्य हमला करने के लिए बार-बार उकसाया था। रिपोर्ट के अनुसार, जो सऊदी अरब खुद को शांतिदूत के रूप में पेश कर रहा था, वह पर्दे के पीछे से ईरान को सैन्य बल से कुचलने की साजिश रच रहा था।

पर्दे के पीछे की गुप्त कॉल्स: 'डिप्लोमेसी नहीं, सीधा हमला करें'

'वॉशिंगटन पोस्ट' द्वारा जारी जानकारी में चार विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि MBS और ट्रंप के बीच कई गोपनीय बातचीत हुई।

दबाव की राजनीति: जब ट्रंप ईरान के साथ मुद्दों को कूटनीति (Diplomacy) से सुलझाने पर विचार कर रहे थे, तब सऊदी राजकुमार उन्हें सीधे सैन्य कार्रवाई के लिए प्रेरित कर रहे थे।

तेल का आश्वासन: एमबीएस ने ट्रंप को भरोसा दिलाया था कि यदि युद्ध के कारण तेल की कीमतों में उछाल आता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो सऊदी अरब इसकी भरपाई करेगा और अमेरिका को हर संभव क्षेत्रीय मदद देगा।

दोहरे मापदंड: एक तरफ दोस्ती का हाथ, दूसरी तरफ युद्ध की पैरवी

इन खुलासों ने मुस्लिम जगत में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है।

दिखावा: एक तरफ सऊदी अरब चीन की मध्यस्थता से ईरान के साथ संबंध सुधारने का नाटक कर रहा था।

हकीकत: दूसरी तरफ वह इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की तर्ज पर अमेरिका पर युद्ध के लिए दबाव डाल रहा था।

विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी अरब का मुख्य उद्देश्य मध्य पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना और अपना क्षेत्रीय वर्चस्व बनाए रखना था।

जेरेड कुशनर और व्हाइट हाउस का कनेक्शन

रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर के साथ अपनी गहरी दोस्ती का इस्तेमाल व्हाइट हाउस की नीतियों को प्रभावित करने के लिए किया। सलमान ने कथित तौर पर ट्रंप को चेतावनी दी थी कि अगर अब ईरान को नहीं रोका गया, तो वह भविष्य में इतना शक्तिशाली हो जाएगा कि अमेरिका के लिए उसे नियंत्रित करना नामुमकिन होगा।

खामेनेई की मौत के बाद भड़का गुस्सा

अयातुल्ला खामेनेई की मृत्यु के ठीक बाद इस रिपोर्ट के आने से ईरान समर्थक गुटों और कई इस्लामिक देशों में सऊदी अरब के खिलाफ नफरत की लहर दौड़ गई है। लोग इसे 'इस्लामिक एकता' के साथ विश्वासघात मान रहे हैं। यह साफ हो गया है कि सऊदी अरब ने एक कुशल खिलाड़ी की तरह अपनी चालें चलीं और पर्दे के पीछे रहकर ईरान के खिलाफ युद्ध की आग को हवा दी।