कल तक जिसे मानते थे सबसे बड़ा दुश्मन, आज उसी तेहरान की धरती पर क्यों झुक रहा है रियाद?

कल तक जिसे मानते थे सबसे बड़ा दुश्मन, आज उसी तेहरान की धरती पर क्यों झुक रहा है रियाद?

मध्य पूर्व (Middle East) की भू-राजनीति में इन दिनों एक ऐसा हैरान करने वाला और नाटकीय मोड़ देखने को मिल रहा है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक दुनिया का कोई भी कूटनीतिक विशेषज्ञ नहीं कर सकता था। कभी एक-दूसरे के खून के प्यासे रहे सुन्नी बहुसंख्यक सऊदी अरब और शिया बहुसंख्यक ईरान के बीच जारी सदियों पुरानी दुश्मनी अब इतिहास के पन्नों में दफन होती नजर आ रही है। एक समय था जब रियाद और तेहरान के शासक हर मंच पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे, और यमन से लेकर सीरिया तक उनके बीच छद्म युद्ध (Proxy War) छिड़े हुए थे। लेकिन आज उसी सऊदी अरब के ताकतवर व्लाइवली प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अपनी तमाम पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर ईरान के साथ रणनीतिक और आर्थिक नजदीकियां बढ़ाने का ऐतिहासिक फैसला किया है। खाड़ी देशों के इस बदलते समीकरण ने दुनिया के सबसे बड़े महाशक्ति अमेरिका और इजराइल की नींद उड़ा दी है, क्योंकि जिस ईरान को अमेरिका दुनिया से अलग-थलग करना चाहता था, आज उसी ईरान के दरबार में सऊदी अरब का हाथ मिलाना वैश्विक राजनीति की सबसे बड़ी घटना बन चुका है।

अमेरिका की जंग में अपना हाथ नहीं जलाएंगे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS): क्या है इस रणनीति के पीछे का असली खेल?

सऊदी अरब के इस अचानक आए कूटनीतिक यू-टर्न के पीछे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की एक बहुत ही सधी हुई और दूरदर्शी आर्थिक व राजनीतिक सोच काम कर रही है। 'विजन 2030' (Vision 2030) के तहत अपने देश की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त कर एक आधुनिक ग्लोबल हब बनाने में जुटे MBS अच्छी तरह जानते हैं कि अगर खाड़ी क्षेत्र में युद्ध और अशांति का माहौल बना रहा, तो उनके देश के मेगा-प्रोजेक्ट्स जैसे 'नियोम' (NEOM) और पर्यटन उद्योग का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति और पश्चिमी देशों की शह पर ईरान के साथ तनाव मोल लेकर अपनी अर्थव्यवस्था को तबाह करने के मूड में अब सऊदी नेतृत्व बिल्कुल नहीं है। प्रिंस सलमान का साफ संदेश है कि वे वाशिंगटन या तेल अवीव की किसी भी ऐसी सैन्य जंग में अपने देश का हाथ नहीं जलाएंगे, जिससे उनके अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय स्थिरता को कोई नुकसान पहुंचे। यही वजह है कि रियाद ने अब 'दुश्मनी खत्म, व्यापार शुरू' की नीति अपनाते हुए पश्चिम एशिया में शांति और संवाद का नया अध्याय लिख दिया है।

खाड़ी देशों में शांति का नया दौर: यमन संकट से लेकर तेल बाजार तक, बदल गई पूरी तस्वीर

सऊदी अरब और ईरान की इस नई दोस्ती का असर केवल कूटनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका जमीन पर भी बेहद सकारात्मक और व्यापक असर दिखाई देने लगा है। यमन में पिछले कई सालों से चल रहे विनाशकारी गृहयुद्ध को समाप्त करने के लिए दोनों देशों ने पर्दे के पीछे से मिलकर काम करना शुरू कर दिया है, जिससे यमन की अवाम को बड़ी राहत मिली है। इसके अलावा, ओपेक (OPEC) और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए भी रियाद और तेहरान अब एक ही मंच पर खड़े नजर आते हैं। मध्य पूर्व के छोटे देशों को अब इस बात का अहसास हो गया है कि बाहरी महाशक्तियों के छद्म युद्ध में पिसने से बेहतर है कि वे आपस में मिलकर क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि का रास्ता चुनें। ईरान के साथ आर्थिक समझौतों और राजनयिक दूतावासों के पुनः खुलने से यह साबित हो गया है कि कूटनीति में कोई भी देश स्थाई दुश्मन या दोस्त नहीं होता, केवल अपने देश के हित सबसे ऊपर होते हैं।

अमेरिकी आधिपत्य को बड़ा झटका: बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर कदम बढ़ा रहा है नया मध्य पूर्व

सऊदी अरब द्वारा ईरान के साथ हाथ मिलाने के इस ऐतिहासिक कदम को वैश्विक स्तर पर अमेरिकी महाप्रभुत्व के लिए एक बहुत बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। दशकों तक मध्य पूर्व के देशों की सुरक्षा और विदेश नीति की दिशा तय करने वाला वाशिंगटन अब इस बात को लेकर चिंतित है कि कैसे उसके पारंपरिक सहयोगी देश चीन की मध्यस्थता और रूस के साथ तालमेल बिठाकर स्वतंत्र फैसले ले रहे हैं। बीजिंग में जब सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंध बहाल होने का समझौता हुआ था, तभी यह स्पष्ट हो गया था कि अब दुनिया एकध्रुवीय नहीं बल्कि बहुध्रुवीय (Multipolars) व्यवस्था की तरफ तेजी से बढ़ रही है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने यह साबित कर दिया है कि वे अपनी शर्तों पर देश चलाएंगे और किसी भी बाहरी ताकत के दबाव में आकर अपनी क्षेत्रीय शांति को दांव पर नहीं लगाएंगे। आने वाले समय में पश्चिम एशिया के ये नए समीकरण वैश्विक राजनीति की दिशा और दशा तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाएंगे।