चीन से अफगानिस्तान के लिए रवाना हुई पहली मालगाड़ी, क्या-क्या लेकर जा रही, भारत को क्यों रखनी चाहिए नजर?
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसी बड़ी हलचल देखने को मिल रही है, जिसने भारत समेत पूरी दुनिया के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। आर्थिक महाशक्ति चीन ने अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के दायरे को और अधिक विस्तार देते हुए सीधे युद्धग्रस्त और सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील देश अफगानिस्तान के साथ अपनी सीधी मालगाड़ी सेवा की आधिकारिक शुरुआत कर दी है। चीन के शिनजियांग प्रांत से हरी झंडी दिखाकर रवाना की गई यह पहली मालगाड़ी अपने साथ भारी मात्रा में कमर्शियल सामान, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, औद्योगिक कच्चे माल और जरूरत का सामान लेकर सीधे काबुल की तरफ बढ़ रही है। दशकों से पश्चिमी देशों और वैश्विक वित्तीय संस्थानों से कटे हुए अफगानिस्तान में चीन की यह सीधी ट्रेन सर्विस केवल एक सामान्य व्यापारिक कदम नहीं है, बल्कि यह बीजिंग की उस बड़ी भू-राजनीतिक चाल का हिस्सा है जिसके जरिए वह तालिबान शासित इस देश के खनिज संसाधनों पर एकाधिकार स्थापित करना चाहता है।
क्या-क्या लेकर जा रही है यह मालगाड़ी? खनिज भंडारों पर कब्जे की फिराक में बैठा है ड्रैगन
प्राप्त जानकारी के अनुसार, चीन से रवाना हुई इस मालगाड़ी में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को पुनर्जीवित करने के नाम पर कई टन भारी मशीनरी, सौर ऊर्जा के उपकरण, निर्माण सामग्री और उपभोक्ता वस्तुएं भेजी जा रही हैं। लेकिन इसके बदले में बीजिंग की नजरें अफगानिस्तान की पहाड़ियों में छिपे उन अरबों-खरबों डॉलर के दुर्लभ खनिज भंडारों (Rare Earth Elements) और लिथियम पर टिकी हैं, जिनका दोहन करने के लिए पश्चिमी देश बरसों से कतराते रहे हैं। तालिबान सरकार के साथ मिलकर चीन ने सुरक्षा की गारंटी के बदले इन बेशकीमती खनिजों को सस्ते दामों पर अपने देश ले जाने का एक गुप्त और मजबूत समझौता तैयार किया है। ड्रैगन की यह आर्थिक घुसपैठ न केवल अफगानिस्तान की घरेलू राजनीति को प्रभावित कर रही है, बल्कि पड़ोसी मुल्कों की आर्थिक निर्भरता को भी पूरी तरह से बीजिंग के इशारों पर मोड़ने का काम कर रही है।
भारत के लिए क्यों चिंता का विषय है यह रेल रूट? रणनीतिक और सुरक्षा मोर्चे पर बढ़ी चुनौतियां
भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो चीन और अफगानिस्तान के बीच शुरू हुई यह मालगाड़ी सेवा सामरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक बहुत बड़ा संकेत है। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मानवीय सहायता के रूप में अफगानिस्तान के लोगों को गेहूं, दवाइयां और चिकित्सा उपकरण भेजकर अपने ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखने की पूरी कोशिश की है, लेकिन पाकिस्तान के रास्ते सीधी कनेक्टिविटी न होने के कारण भारत की सीमाएं सीमित हो जाती हैं। अब जब चीन ने पाकिस्तान के रास्ते अपनी रेल और सड़क संपर्क को सीधे काबुल तक जोड़ लिया है, तो इससे भारत विरोधी ताकतों और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को क्षेत्रीय स्तर पर एकतरफा बढ़त मिल जाएगी। इसके अलावा, हिंद महासागर और मध्य एशिया के बीच की इस धुरी पर चीन का कब्जा होना भारत की सुरक्षा नीति के लिए आने वाले समय में एक गंभीर चुनौती साबित हो सकता है, जिस पर नई दिल्ली की खुफिया एजेंसियों और विदेश मंत्रालय की पैनी नजर बनी हुई है।
मध्य एशिया के बदलते समीकरण और नई विश्व व्यवस्था: भविष्य में क्या होंगे इसके दूरगामी परिणाम?
चीन द्वारा अफगानिस्तान में रेलवे और व्यापारिक नेटवर्क का जाल बिछाना यह साबित करता है कि अब वैश्विक महाशक्तियां पारंपरिक कूटनीति को छोड़कर सीधे जमीन पर पकड़ मजबूत करने की नीति पर काम कर रही हैं। अमेरिका और पश्चिमी देशों के अफगानिस्तान से अचानक पैर खींचने के बाद जो शून्य पैदा हुआ था, उसे भरने का काम अब पूरी तरह से चीन और उसके सहयोगी देश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या चीन का यह महत्वाकांक्षी रेल प्रोजेक्ट तालिबान शासन को आर्थिक स्थिरता दे पाता है या फिर यह मध्य एशिया में एक नए उपनिवेशवाद की शुरुआत साबित होता है। भारतीय रणनीतिकारों के लिए यह समय अपनी विदेश नीति और क्षेत्रीय कूटनीति को और अधिक धारदार बनाने का है, ताकि बदलती हुई भू-राजनीतिक परिस्थितियों में देश के रणनीतिक हित पूरी तरह सुरक्षित रह सकें।