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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : अमेरिका और ईरान के बीच पिछले एक महीने से जारी भीषण युद्ध को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक का सबसे बड़ा बयान दिया है। गुरुवार को व्हाइट हाउस से राष्ट्र को संबोधित करते हुए ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिकी सेना ने अपना 'मिशन' लगभग पूरा कर लिया है और ईरान में सत्ता परिवर्तन हो चुका है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत ईरान की नौसेना और वायु सेना पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुकी है। ट्रंप के इस बयान ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है, खासकर उनके उस दावे ने जिसमें उन्होंने कहा कि अब यह युद्ध महज 2 से 3 हफ्तों का मेहमान है।

ईरान की नौसेना तबाह, ट्रंप ने थपथपाई सेना की पीठ

अपने संबोधन में डोनाल्ड ट्रंप बेहद आक्रामक नजर आए। उन्होंने कहा, "पिछले चार हफ्तों में हमारी सेनाओं ने युद्ध के मैदान में जो त्वरित और निर्णायक जीत हासिल की है, वह ऐतिहासिक है। ईरान, जो दुनिया का नंबर एक आतंक का प्रायोजक था, अब घुटनों पर है।" ट्रंप ने दावा किया कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) पर ईरान का नियंत्रण खत्म हो चुका है और शासन के कई शीर्ष नेता मारे गए हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि अमेरिका का उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना था, जिसमें वे सफल रहे हैं।

सत्ता परिवर्तन पर ट्रंप का 'यू-टर्न' और होर्मुज की चुनौती

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने पहले ईरान में सत्ता परिवर्तन के लक्ष्य से इनकार किया था, लेकिन अब वे खुद कह रहे हैं कि वहां सत्ता बदल चुकी है। हालांकि, कूटनीतिक गलियारों में इसे ट्रंप का 'यू-टर्न' माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध खत्म करने की जल्दबाजी के पीछे सबसे बड़ा कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) का बंद होना है। दुनिया का करीब 25% तेल और गैस इसी मार्ग से गुजरता है, जिसे ईरान ने ठप कर दिया है। अमेरिका लाख कोशिशों के बाद भी इस समुद्री मार्ग को खुलवाने में नाकाम रहा है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट मंडरा रहा है।

घर में घिरे ट्रंप: लोकप्रियता में गिरावट और सहयोगियों का किनारा

ट्रंप के युद्ध विराम के संकेत के पीछे केवल सैन्य सफलता नहीं, बल्कि आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव भी है। नाटो (NATO) देशों ने इस जंग से पल्ला झाड़ लिया है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे पुराने सहयोगियों ने अमेरिका का साथ देने से मना कर दिया है। वहीं, अमेरिका के भीतर भी हालात सामान्य नहीं हैं। एक ताजा सर्वे के मुताबिक ट्रंप की लोकप्रियता रेटिंग गिरकर -17 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई है।

युद्ध रोकने की 5 बड़ी मजबूरियां

ट्रंप ने भले ही जीत का बिगुल फूंका हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही इशारा कर रही है। अमेरिका में ईंधन की कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन तक बढ़ गई हैं, जिससे जनता में भारी गुस्सा है। इसके अलावा, अमेरिकी सेना के गोला-बारूद का भंडार तेजी से खाली हो रहा है। ईरान में सरकार विरोधी लहर की उम्मीद भी धराशायी हो गई है, क्योंकि वहां मोजतबा खामेनेई ने मजबूती से कमान संभाल ली है। अब देखना यह होगा कि क्या ट्रंप वास्तव में अगले 21 दिनों में इस महायुद्ध को समाप्त कर पाते हैं या यह महज एक चुनावी दांव है।