Prabhat Vaibhav,Digital Desk : होली का नाम सुनते ही आंखों के सामने उड़ते हुए गुलाल, पानी की बौछारें और मस्ती भरे चेहरों की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सदियों पहले, जब आज की तरह सिंथेटिक रंग और पिचकारियां नहीं होती थीं, तब हमारे पूर्वज यह त्योहार कैसे मनाते थे? रंगों के इस उत्सव का आगाज़ आखिर हुआ कैसे? होली की यह परंपरा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी आस्था, अटूट प्रेम और प्रकृति के साथ जुड़ाव की एक सुंदर दास्तां है।
श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम से शुरू हुआ रंगों का सफर
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंगों वाली होली की शुरुआत ब्रज के राजा भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की कथाओं से जुड़ी है। कहा जाता है कि कान्हा अपने सांवले रंग को लेकर अक्सर चिंतित रहते थे। तब माता यशोदा ने उन्हें खेल-खेल में सुझाव दिया कि वे राधा के चेहरे पर अपनी पसंद का कोई भी रंग लगा दें। नटखट कृष्ण ने ऐसा ही किया और राधा व गोपियों के साथ रंगों से ठिठोली शुरू कर दी। ब्रज से शुरू हुई प्रेम की यह रीत धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गई, जिसे आज हम 'धुलेंडी' के रूप में मनाते हैं।
बिना केमिकल कैसे सजती थी होली की महफ़िल?
प्राचीन काल में होली पूरी तरह से 'इको-फ्रेंडली' और प्राकृतिक होती थी। उन दिनों लोग रसायनों के बजाय प्रकृति के खजाने से रंग चुनते थे:
टेसू के फूल: पलाश या टेसू के फूलों को रात भर पानी में भिगोकर केसरिया रंग तैयार किया जाता था, जो त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता था।
हल्दी और चंदन: पीले रंग के लिए शुद्ध हल्दी और खुशबू के लिए चंदन के लेप का तिलक लगाया जाता था।
फूलों की होली: गुलाब, गेंदा और गुड़हल की पंखुड़ियों को एक-दूसरे पर उड़ाकर प्रेम का इजहार किया जाता था।
होलिका दहन: बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक
रंगों वाली होली से एक दिन पहले 'होलिका दहन' की परंपरा है। यह कथा भक्त प्रह्लाद और उनके अहंकारी पिता हिरण्यकशिपु से जुड़ी है। जब भगवान ने प्रह्लाद की रक्षा की और अग्नि में न जलने का वरदान पाने वाली होलिका खुद भस्म हो गई, तभी से समाज में व्याप्त बुराइयों को जलाने के प्रतीक के रूप में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि सत्य और भक्ति की हमेशा विजय होती है।
फाग के गीत और पकवानों की मिठास
पुराने समय में होली केवल रंग लगाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक मेल-मिलाप का सबसे बड़ा जरिया था। गांवों की चौपालों पर ढोल-मंजीरों की थाप पर 'फाग' के गीत गूंजते थे। घरों में गुझिया, मालपुआ और दही-बड़े जैसे पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू महकती थी। लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते थे। आज के दौर में भले ही बाजारू रंगों ने जगह ले ली है, लेकिन ब्रज की गलियों में आज भी वही प्राचीन सादगी और प्रेम की खुशबू महसूस की जा सकती है।




