Prabhat Vaibhav,Digital Desk : बिहार के सियासी गलियारों में एक बार फिर से 'खेला' होने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य की राजनीति में दशकों तक बैसाखी के सहारे चलने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अब अपना 'मिशन बिहार' पूरी तरह बदल दिया है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा इस बार रामनवमी के पावन अवसर पर बिहार को उसका पहला शुद्ध भाजपाई मुख्यमंत्री देने की तैयारी में है। चर्चा इस बात की है कि जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार अब भाजपा के अगले मुख्यमंत्री का चेहरा तय नहीं करेंगे, बल्कि इसका फैसला सीधे दिल्ली दरबार यानी भाजपा हाईकमान द्वारा लिया जाएगा। इस नई रणनीति ने न केवल विपक्षी खेमे में बल्कि गठबंधन के भीतर भी हलचल पैदा कर दी है।
नीतीश का 'किंग मेकर' वाला दौर खत्म? भाजपा का नया प्लान
बिहार की राजनीति में लंबे समय तक नीतीश कुमार ही गठबंधन का चेहरा और मुख्यमंत्री पद के इकलौते उम्मीदवार रहे हैं, लेकिन बदलते समीकरणों ने अब नई कहानी लिखनी शुरू कर दी है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि पार्टी का आधार राज्य में अब इतना मजबूत हो चुका है कि उसे किसी क्षेत्रीय दल के चेहरे की जरूरत नहीं है। संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस बार स्पष्ट संकेत दिए हैं कि मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार का चयन करते समय 'जातीय समीकरण' के साथ-साथ 'हिंदुत्व' के एजेंडे को भी प्राथमिकता दी जाएगी। अब नीतीश कुमार की भूमिका एक मार्गदर्शक की रह सकती है, लेकिन सत्ता की चाबी भाजपा अपने पास ही रखना चाहती है।
रामनवमी और 'भगवा' लहर: प्रतीकों की राजनीति
भाजपा के भीतर चल रही चर्चाओं की मानें तो रामनवमी के अवसर पर किसी बड़े नाम का ऐलान कर पार्टी एक तीर से दो निशाने साधना चाहती है। पहला, बिहार के कार्यकर्ताओं में जोश भरना और दूसरा, राज्य में अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करना। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि जब तक पार्टी का अपना मुख्यमंत्री नहीं होगा, तब तक बिहार में विकास की 'डबल इंजन' रफ्तार पूरी तरह से जमीन पर नहीं उतरेगी। रामनवमी के प्रतीकों का इस्तेमाल कर भाजपा बिहार में अपनी वैचारिक पकड़ को और मजबूत करने की कोशिश में है।
चेहरे की रेस में कौन-कौन? कयासों का बाजार गर्म
अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? इस सवाल ने पटना से लेकर दिल्ली तक की नींद उड़ा रखी है। रेस में कई दिग्गजों के नाम शामिल हैं, जिनमें सवर्ण और पिछड़ी जातियों के बड़े नेताओं का संतुलन बिठाने की कोशिश की जा रही है। जानकारों का कहना है कि भाजपा इस बार किसी ऐसे चेहरे को आगे ला सकती है जो संगठन का वफादार हो और जिसकी जनता में बेदाग छवि हो। दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा के बीच होने वाली आगामी बैठकों में इस नाम पर अंतिम मुहर लग सकती है। यदि ऐसा होता है, तो बिहार की राजनीति के इतिहास में यह एक ऐतिहासिक मोड़ होगा, जहां भाजपा बिना किसी बैसाखी के सत्ता के शिखर पर बैठने का साहस दिखाएगी।
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